आक्रमणों के प्रभाव

आक्रमणों के प्रभाव

मुहम्मद गोरी के भारतीय आक्रमण तूफान की भाँति सिद्ध हुए । उसने भारत में जमकर हमले किये और वह जब भारत से लोटता या तो अपने विजित प्रदेश के प्रबन्ध की व्यवस्था अपने आदमियों के अधीन करके जाता था । इसलिए यह स्वाभाविक था कि उसके आक्रमण के प्रभाव भी भारत पर चिरस्थायी होते । हमें उसके आक्रमणों के भारत पर निम्नलिखित प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैँ…

राजनीतिक प्रभाव

(1) धर्म प्रधान राज्य की स्थापना सैद्धान्तिक रूप से दिल्ली सस्तनत पूरी खलीफा के आधीन थी । इस कारण दिल्ली के मुस्लिम सुल्तानों क्रो खलीफा के अधीन रहकर धर्म-प्रधान राज्य की स्थापना करनी पडी । 1206 ई. के उपरान्त भारत में इस्लाम प्रधान राज्यों की स्थापना करनी पडी । इस्लाम के अलावा अन्य धर्म दिल्ली के सुल्तानों द्वारा नफरत की निगाह से देखै जाने लगे । इस्लाम धर्म के अनुयायियों को राजकीय पद प्राप्त होते थे । सच्चे अर्थ में राज्य के नागरिक मुसलमान ही माने जाने लगे । इस मुस्लिम बिजय क्रो यदि वास्तविक रूप में देखा जाये तो हसने स्पष्ट रूप से दो संस्कृतियों व दो सभ्यताएँ स्थायी रूप से भारत में निर्मित कर दी’ । कुछ मुस्लिम इतिहासकारों की मान्यता हैं कि धर्म-प्रधान राज्यों की स्थापना के पीछे धार्मिक भावना इतनी प्रबल नहीं थी जितनी कि राजनीतिक भावना थी ।

(2) शक्तिशाली व्यक्ति ही सुल्तान बनता था. कुरान ने उत्तराधिकार के सन्दर्मं में कोई नियम निर्धारित नही किया है । इस्लाम के सिद्धातों मे निर्वाचन प्रणाली की मी व्यवस्था नहीं है । अत 1206 ईं से 1857 ईं. तक मुसलमानों का राज्य भारत में रहा, इसमें गद्दी के लिए निरन्तर संघर्ष ही होते रहे । केवल तलवार क्रो शक्ति ही उत्तराधिकारी का निर्णय करती थी ।

(3) प्रशासन में गुलामों का प्रभुत्व. तुर्कों में गुलाम प्रथा बडी प्रबल थी । प्रत्येक अमीर व सुल्तान गुलाम रखना अपने गौरव का प्रतीक समझता था । परन्तु वे गुलाम अपने स्वामी क्रो प्रसन्न काके उच्च पद भी प्राप्त कर सक्रत्ते थे । भारत का प्रथम तुर्की शासक कुतुबुद्दीन ऐबक बना था । वह शाहबुहीन गोरी का खरीदा हुआ गुलाम था । दूसरा मुस्लिम शासक इस्तुतमिश कुतुबुद्दीन ऐबक्र का गुलाम था । इस प्रकार स्पष्ट है कि मध्यकाल के पूर्वार्द्ध मेँ गुलामों का प्रशासन में बड़ा महत्त्व रहा । मिन्हाज-उस-सिराज ने अपनी पुस्तक तराकाते नासिरी’ तथा जियाउद्दीन बरनी ने अपनी पुस्तक तारीखें फिरोजशाहो’ में यह सिद्ध किया है कि समस्त राजकीय महत्त्वपूर्ण पर्दो पर तुर्क अधिकारियों का ही एकाधिकार था । ये सब तथाकथित गुलाम वंश के ही थे । हस्तुतमिश के शासन में चालीस गुलामों की संस्था विख्यात थी । बलबन भी इसी दल का एक सदस्य था जो आगे चलकर प्रधानमन्दी व दिल्ली का सुल्तान बना ।

(4) सामन्तवाद का ह्रास मुसलमानों के भारत आने से पूर्व राजपूत नरेशों के यहाँ सामन्तवाद प्रबल रूप में विद्यमान था । सामन्त राजपूत व शासक घराने के ही द्दों, यह आवश्यक नहीं था । इनमें सामान्य लोग व नीच जाति के भी लोग होते थे । राजपूत नरेशों को ईन सामन्ती पर बहुत कुछ अवलम्बित रहना पड़ता था । परन्तु मुसलमानों ने सत्ता में आते ही राजपूत काल के सामन्तो क्रो समाप्त का दिया । इस नीति का परिणाम यह निकला कि तुर्क शासन में राजपूत सामन्त नहीं रहे ।

(5) शासन का केन्दीयकरण होना सल्लनत का प्रशासन फारसी परम्पराओं पर आधारित था । अत: राज्य का स्वामी केवल सुल्तान ही होता था । राज्य का शासन पूर्णत: उसके हाथों में केन्दीमूत होता था । राज्य का वह सर्वोच्च होता था । मंत्रियों व अन्य उच्चाधिकारियों को नियुक्ति वह स्वयं करता था । वे सुल्तान के प्रति ही उत्तरदायी होते थे । सैनिक अधिकारी उसी के द्वारा नियुवत्त होते थे । अवत्तादार भी उसी के द्वारा नियुक्त होते थे । उसकी इच्छा ही कानून का रूप धारण करती थी । उनके निर्णय अन्तिम ढोते थे । वे केवल कुरान की शरीयर्तों से ही आबद्ध होते थे । शासन पर मुल्ला व मौलवियों का धी काफी प्रभाव रहता था ।

परन्तु ये राजनीतिक परिवर्तन केवल नगरों को ही प्रभावित कर सके थे । ग्रामीण प्रशासन उनसे अप्रभावित रहा । जो मुसलमान भारत आये उन्होंने आरम्भ में सम्बन्थ केवल नगरों से ही रखा, क्योंकि वे केवल शहरी योद्धा थे । आरओ. त्रिपाठी ने अपने पुस्तक सम एस्पैबटूस आँफ मुस्लिम एडमिनिस्ट्रेशन में लिखा है कि” तुर्क मुल रूप से सैनिक थे, वे लडाईयों और विजर्यो में अधिक विस्वास रखते थे” । अत उन्होंने ग्रामों की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया । परन्तु इसके साथ ही यह भी कहना पडता है कि तुर्कों की विजय से ग्रामों मेँ क्रोईं क्रान्ति भी नही आईं । संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि मुसलमानों के भारत में आने से केद्धित राजस्व व्यवस्था प्रचलित हुईं और राजपूत सामन्तो की स्वतन्त्रता समाप्त हो गई, परन्तु परास्त राजपूतों का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ । उन्होंने अपनी प्रभुता प्राप्ति के लिए छापामार की युद्ध प्रणाली जारी रखी और तुर्क सुल्तानों से बराबर लोहा लेते रहे 1 इस कारण न तो तुर्वठ सुल्तान भारत में अपनी बहुत मनमानी काने क्रो स्वतन्त्र रहे औरन भारतीयों का आत्मविश्वास तथा सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना का ही विनाश हुआ ।

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