कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210 ईं.)

कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210 ईं.) 1 ‘क्या

राज्यारोहण मुहम्मद गोरी अपनी आकस्मिक मृत्यु (15 मार्च, 1206 ई3 के कारण अपना कोई उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं कर सका था । उसके क्रोईं पुत्र भी नहीं था । ऐसी अवस्था में वह अपने गुलामों पर ही विश्वास काता था । मिनहाज-सिराज के अनुसार, उसने एक वार स्पष्ट भी कर दिया था कि मेरे उपरांन्त मेरे दास हो उत्तराधिकारी होंगे और वे अपने राज्यों के खुतबे में मेरा नाम सुरक्षित रखेंगे । उसकी मृत्यु के उपरान्त ऐसा ही हुआ । हालांकि उसकी मृत्यु पर उसका भतीजा गयन्तुद्दीन महमूद शासक बना । परन्तु वह विलासी था । ‘ सदा रास-रंग में ही व्यस्त रहता था । उधर मध्य एशिया की स्थिति अशान्त थी । ख्यठरिज्म का शाह निरन्तर गजनी पर अधिकार करने का प्रयास कर रहा था । इन परिस्थितियों में गयासुद्दीन अपने चाचा के विशाल साम्राज्य को सम्भालने में अक्षम था और वह अपने पैतृक राज्य वह फिरोजक्रोह से ही सन्तुष्ट था । वह अपने चाचा गोरी के राज्य में हिस्सा बंटाने को उत्सुक नहीं था स्वात: उसका साम्राज्य उसके तीन गुलामों ने बाँट लिया और भारत के राज्यों का स्वामी कुतुबुद्दीन ऐबक डी बना । डॉ. एएल. श्रीवास्तव की धारणा है कि मुहम्मद गोरी की यह इच्छा थी कि भारत पें उसका उत्तराधिकारी कुतुबुद्दीन ऐक्य ही बने, क्योंकि 1206 ईं. में उसने उसे नियमित रूप से अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर ‘मलिक’ की उपाधि से विभूषित कर दिया था । जब मुहम्मद गोरी की मृत्यु का समाचार ज्ञात हुआ तो लाहौर के नागरिकों ने कुतुबुद्दीन क्रो राजशक्ति धारण करने के लिए आमन्वित किया, क्योंकि उन्हें उसकी शक्ति व योग्यता में विस्वास था । डॉ. ईश्वरी प्रसाद की धारणा है कि “तुर्की अमीरों तथा सेनानायकों ने उसको सुल्तान चुना और गोर के शासक ने भी उसके अधिकारारूढ़ होने में अपनी सहमति प्रक्ट की । हन सब तथ्यों से स्पष्ट है कि कुतुबुद्दीन ऐबक को अपने स्वामी के मरने पर भारत की राजसत्ता प्राप्त करने में कठिनाई नहीं । त्वारिखे मुबारकशाही से ज्ञात होता है कि 1205 ईं. में कुतुबुद्दीन दिल्ली से शुभ नगर को रवाना हुआ और 24 जून 1206 ईं. में वह लाहौर मेँ सिहासनारूढ़ हुआ । परन्तु अजीज अहमद का कहना है कि वह 17 मार्च, 1206 ईं. को ही गद्दी पर बैठ गया था । सिंहासन पर बैठने के उपरान्त उसने सामन्तो व जनसाधारण की इतनी उदारता से पैसा लुटाया कि आम जनता उसे ‘लाख-बख्त’ कहने लगी । परन्तु अपने अभिषेक के समय वह केवल ‘मलिक’ तथा सिपहसालारकी पदवियों से ही अलंकृत था । ये दोनों पदवियाँ उसे अपने स्वामी मुहम्मद गोरी से ही प्राप्त हो गईं थीं । सुल्तान की उपाधि उसने कभी धारण नहीं क्री थी । इसीलिए उसने अपने नाम का कोई सिक्या नहीं चलाया । कुछ समय बाद गयासुद्दीन मुहम्मद स्वयं ने उसे सुल्तान स्वीकार कर लिया था और सारे राजचिन्ह उसे भिजवा दिए थे ।

बाल्यकाल 1206 ईं. में मुहम्मद गोरी की मृत्यु हो जाने पर तुबुद्दीन ऐबक्र भारत र्में मुहम्मद गोरी के राज्यों का स्वामी बना । जब मुहम्मद गोरी भारत से हुंट रहा था तो वह ऐबक को ‘मलिक’ नियुक्त का गया था तु। ऐबक तुर्किस्तान का रहने वाला था और उसके माता-पिता तुर्क थे । उसको निशापुर के काजी फखरुद्दीन अब्दुल अजीज ने खरीद लिया था । फखरुद्दीन एक उदारवृति का मनुष्य था । अत: उसने कुतुबुद्दीन का पालन अपने पुत्र की भाँति किया । इसकी निगरानी में कुतुबुद्दीन घुड़सवारी सीखने व शिक्षा पाने में भी समर्थ रहा । परन्तु जब फखरुद्दीन का देहान्त हो गया तो उसके उत्तराधिकारियों ने उसे एक सौदागर के हाथों बेच दिया । वह सौदागर कुतुबुद्दीन क्रो गजनी ले आया । गजनी में उस पर मुहम्मद गोरी की दृष्टि पडी । सुल्तान ने उसकी कुरूपता का तनिक भी ध्यान न करते हुए उसे खरीद लिया । शनैट्वेंशनै: वह अपने गुणों के कारण सुल्तान का बिश्वास-भाजन बन गया । शीघ्र ही वह सुल्तान द्वारा “अमीरढए-अफ्लूर’ (घुड़साल का अधिकारी) नियुक्त किया गया । भारत विजय में मी कुतुबुद्दीन अपने स्वामी मुहम्मद गोरी के साथ था । त्तराहन के युद्ध में उसने अपनी अभूतपूर्व वीरता का परिचय दिया था । हसी कारण जब 1192 ईं. मेँ मुहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान को परास्त कर गजनी लौटा तो उसने कुतुबुद्दीन को ड्डराम और समाना का प्रशासन सौंप दिया था । 1206 ईं. में जब मुहम्मद गोरी खोखरों क्रो दबा कर गजनी लौट रहा था तो कुतुबुद्दीन क्रो वह भारत का वायसराय (प्रतिनिधि) नियुक्त कर गया था । यहीं से भारत में उसका राजनीतिक जीबन आरम्भ होता है ।

कुतुबुद्दीन भारत मेँ 1192 ईं. में आ गया था और इस युद्ध (सराहन का द्वितीय युद्ध) में उसने अपना युद्ध कौशल प्रर्दशित कर अपने स्वामी मुहम्मद गोरी का दिल व विश्वास जीत लिया था । इसीलिए गोरी उसे भारत में अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया और 1210 ईं. तक यहीं रहा । केवल 1203 ईं. में वह तीन मास के लिए गज़नी गया था । उसके इस 18 (1192-1210 ईं) वर्ष के काल क्रो हम तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं…

(1 ) 1192 से 12०6 ईं. इन 14 वर्षों में वह अपने स्वामी के साथ सैनिक अभियानों मेँ सहयोग करता रहा और गोरी को विजयी बनाता रहा । उसकी इन सेवाओँ से तुष्ट होकर ही गोरी ने भारत में उसे अपना वायसराय नियुक्त किया और मलिक व सिपहसालार की पदबियों से अलंकृत किया । इसी असैं में उसे ‘अली-अहद’ भी घोषित का दिया था । अली-अहदृ का अर्थ होता है उत्तराधिकारी ।

(2) 1206-1208 ई. ८ 1206 ईं. में कुतुबुद्दीन क्रो लाहोर के मुइजी तुर्कों ने लाहौर आमन्वित कर अपना सुल्तान चुन लिया था । इस समय उत्तरी भारत के प्रमुख स्थानों पर गोरी की सत्ता अवश्य स्थापित हो गईं थी पर वह सुदृढ नहीं हुई थी । इस काल में उसने राज्य का सुदृढीकस्था किया ।

(3) 1208-1210 ईं. : इस काल मेँ उसने अपने राज्य में एक स्वतन्त्र सुल्तान की भाँति शासन किया । दासता से तो वह पहले ही मुक्त हो चुका था । गजनी के सुल्तान व मुहम्मद गोरी के भतीजे गयासुद्दीन मुहम्मद ने भी उसे भारत का स्वतन्त्र शासक स्वीकार कर लिया था । गयासुद्दीन ने उसके पास गज़नी से सिंहासन, छत्र, पताका एवं नवकारा भी राजडचिन्हों के प्रतीक स्वरूप भेज दिए थे । अपनी कूटनीति से वह खलीफा को भी प्रसन्न करने में सफल हो गया था ।

प्रारम्भिक कठिनाइयाँ तथा उसकी नीति कुतुबुद्दीन ऐबक क्रो भारत का शासक बनते ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । मुहम्मद गोरी की आकस्मिक मृत्यु अंधकुई पर हो गई । उसकी यह आकस्मिक मृत्यु गजनी व भारत के विजित प्रदेशों की सुरक्षा के लिए महान् संकट सिद्ध हुईं । वह स्वयं किसी क्रो अपना उत्तराधिकारी घोषित नहीं कर सका था । उसके भतीजे गयासुद्दीन को गज़नी का सुल्तान अवश्य बनाया, पर वह उन परिस्थितियों में अक्षम सिद्ध हुआ । अपने विलासी जीवन के कारण वह ख्वारिज्म के शाह से मुकाबला नहीं कर सकता था । यही समस्या कुतुबुद्दीन के समक्ष प्रस्तुत थी । उसने सोचा कि यदि मैं अपने को गयासुद्दीन के अधीन समचूँगा तो ख्वारिज्म का शाह भारत पर आक्रमण करु सकेगा । दूसरे मुहम्मद गोरी के ऐबक ही दास नहीं था । उसके अनेक दास थे, जिनमें यल्दीज और कुचाचा प्रमुख थे और वे प्रभावशाली भी थे । उन्होंने मुहम्मद गोरी की मृत्यु के उपरान्त उसके साम्राज्य क्रो आपस में बांट लिया । गज़नी का स्वामी ताजुद्दीन यल्दीज और मुलतान का स्वामी नासिरुद्दीन कुबाचा बन गया था । स्वयं कुतुबुद्दीन ऐबक के अधिकार मेँ उत्तर भारत में उसके द्वारा विजित प्रदेश थे । दिल्ली भी उसी के अधिकार में थी । लखनौती का शासन बरिब्तयारुद्दीन खलजी के हाथ में था । यल्दीज, जो गजनी का स्वामी बन बैठा था, वह दिल्ली को भी गजनी का ही भाग समझ रहा था । परन्तु ऐबक ने 1208 ई. में यल्दीज को परास्त का दिया । इस प्रकार उसने अपने एक प्रबल शत्रु को दबा दिया । यल्दीज़ ने अपनी पुत्री का विवाह भी ऐवक के साथ कर दिया । ऐबक ने यल्दीज कौ प्रभुता कभी दिल्लो पर स्वीकार नहीं की । इसके परिणामस्वरूप वह दिल्ली सल्लनत का बिकास स्वतन्त्र रूप से कर सका । नासिरुद्दीन कुवाचा का विरोध समाप्त करने की दृष्टि से कुतुबुद्दीन ने उसके साथ अपनी बहिन की शादी कर दी । इन गुलामों के विरोध के अलावा कुतुबुद्दीन के समक्ष दूसरी कठिनाई यह थी क्रि गुलाम होने के कारण तुर्के उसे सुल्तान स्वीकार करने को तैयार नहीं थे । इतिहासकार इब्लबतूता उसे प्रभुता सम्पन्न शासक नहीं मानता था । इस कारण उसने दिल्ली के सुल्तानों में उसके नाम का उल्लेख नहीं विध्या । वह चौदहवीं सदी में भारत आया था । परन्तु फिरोजकोह के सुल्तान ने उसे एक स्वतन्व शासक के रूप में स्वीकार किया और उसके पास राज-चिन्ह भी भेज दिए । लाहौर के अमीर तो उसे सुल्तान मानते ही थे, क्योंकि लाहौर में उसे आमचिंत कर वही राज्याभिषेक किया था । नासिरुद्दीन के साथ वैवाहिक सम्बन्थ कर और यल्दीज को परास्त कर कुतुबुद्दीन ने गजनी की ओर देखा ही नहीं । 1208 ई. में कुतुबुद्दीन ऐवक ने दासता से भी मुक्ति पाली थी, परन्तु इसके उपरान्त भी उसने अपने आपक्रो गोरी का सिपहसालार ही माना । इसी कारण उसने अपने नाम के सिवके भी प्रचलित नहीं किए और न अपने नाम का खुतबा ही पढा । इस कारण मी उसकी सर्वोच्चता पर आँच नहीं आ रही थी ।

भारत में भी कुछ गुलाम ऐसे थे जो ऐबक के लिए सिरदर्द बने हुए .थे । उनमें एक बदायूँ का गवर्नर… इस्तुतमिश था और दूसरा अली मर्दोन खाँ था जो हस्तियारउद्दीन का वध करके बंगाल का शासक वन बैठा था । परन्तु बंगाल के खलजी उसे हत्यारा समझकर नहीं चाहते थे । अत: वह भागकर ऐबक की शरण मेँ आ गया था ।. इसके अलावा उस समय भारत का वातावरण भी उसके अधिक अनुकूल नहीं था । मुहम्मद गोरी के मरने की सूचना पाते ही राजपूत नरेशों ने भारत से तुर्कों के प्रभुत्व को समूल नष्ट करने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया । चन्देल शासक त्रैलोक्य वर्मा ने कालिजर पर पुन: अपना अधिकार कर लिया और उसने तुर्कों क्रो अपने राज्य से बाहर कर दिया । परिहारों ने ग्वालियर से तुर्कों को निष्कासित करके उस पर अपना अधिकार कर लिया । जयचन्द के उत्तराधिकारी हरिशचन्द्र ने गहड़वालों की शक्ति क्रो पुन: गठित करने का प्रयास किया और उसने वदायूँतथा फर्रुखाबाद क्षेत्रों में तुर्कों पदाधिकारियों को हटाना आरम्भ किया । कईं छोटे राज्यों ने भी दिल्ली क्रो कर भेजना वन्द कर दिया । बंगाल के सेनवंशी शासक ने बंगाल के पश्चिम में अपने साम्राज्य को विस्तृत करने का प्रयास किया । कालिजर अथवा ग्वालियर क्रो ऐवक विजित नही’ कर सका था । जो राज्य मुस्लिम प्रभुत्व में थे और कर भी देते थे, उनकी शासन-व्यवस्था अच्छी नही’ थी । इस प्रकार स्पष्ट है कि जब कुतुबुद्दीन सुल्तान बना तो भारत की राजनीतिक अवस्था मी उसके अनुकूल नहीं थी ।

किन्तु इन विभिन्न कठिनाइयों में भी कुतुबुद्दीन विचलित नहीं हुआ । उसने समस्याओं को अच्छी तरह समझते हुए उनका सही समाधान करने का प्रयास किया । उसका शक्ति में विश्वास था , पर हर जगह उसने शक्ति का प्रयोग नहीं किया । कहीँ नर्म नीति अपनाकर दोस्ती की नीति अपनाई तो कहीं सैनिक अभियान भी भेजे । इसके अलावा उसने वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके भी अपने प्रतिद्वन्हिर्यो से सुंलटने का प्रयास किया और वह अपने इस उद्देश्य में सफल रहा ।

Leave a Reply

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: