दिल्ली सल्सनत्त की स्थापना

दिल्ली सल्सनत्त की स्थापना

इतिहास इस तथ्य को स्पष्ट उजागर करता है कि विश्व में साम्राज्य बनते और विनिष्ट होते रहे हैं और उनके निर्माण व विनाश में युद्ध निर्णायक भूमिका निभाते हैं । यही बात तराइन के दूसरे युद्ध (1192 ई) के लिए कही जा सकती है । जैसाकि इससे पूर्व स्पष्ट कर आये हैं कि मुहम्मद गोरी भारत में तुकों साम्राज्य की स्थापना के उद्देश्य से आया था । पृथ्वीराज चौहान को 1192 ईं. में तराइन के दूसरे युद्ध में परास्त कर उसने उत्तरी भारत में इस उद्देश्य की पूति के लिए अपना मार्ग साफ कर लिया था । वह आगे बढ़ना चहाता था परन्तु अवसर की तलाश में रह गया । इस युद्ध में कुतुबुद्दीन ऐबवठ ने अपनी वीरता, स्वामी भक्ति तथा कूटनीति से अपने स्वामी गोरी को आश्वस्त कर दिया था । इसीलिए 1192 ईं. में उसने ऐबक क्रो गजनी बुलाया 1 ऐबक्र गजनी में छ: मास रुका और इस अन्तराल में अपने स्वामी के साथ क्रन्यौज बिजय की योजना बना डाली । योजना के अनुसार 1194 ईं. में उन्होंने जयचन्द गहड़बाल को (चन्दवार) के युद्ध मेँ परास्त कर उसे ठिकाने लगा दिया । गजनी लौटते समय गोरी ने ऐबक को भारत में अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया था । अपने स्वामी की अनुपस्थिति में उसने बदायूँ व बनारस पर अधिकार कर लिया । 1202- 03 ई. में उसने चन्देल नरेशों को परास्त कर कालिंजर, महोबा तया खुजराहो पर तुर्कों प्रभुत्व स्थापित कर दिया । इस विजय के उपरान्त तुर्कों सेना अवध तक फैल गईं । इन सैनिक अभियानों में ऐबक को इस्तियार मुहम्मद बिन बस्तियार खलजी नामक सैनिक ने महान् सहयोग दिया था । हालांकि व्यक्तित्व में खलजी आकर्षक नहीं था, पर वह उत्साह व वीरता में कम नहीं था । उसने अपनी वीरता से बंगाल व बिहार में भी तुर्की प्रभाव स्थापित कर दिया । गोरी भी 1202 03 ईं. मेँ इस निष्कर्ष पर आ पहुँचा था कि ख्वारिज्म के शाह के आगे गोर का अस्तित्व नहीं रहेगा । अत: उसने अपने वायसराय कुतुबुद्दीन ऐबक के माध्यम से भारत पर ही ध्यान देना आरम्भ किया डेर उसके माध्यम व प्रयास से ही भारत में मामलूकतुर्कों की सत्ता स्थापित हुई ।

मामलूक तुर्क कौन थे तुर्क कौन थे इस सन्दर्भ में संक्षेप में इससे पूर्व बताया जा चुका है । प्रारम्भ मेँ ये मुसलमान नहीं थे । ये चीन के पदिचमी भाग व मंगोलिया के घास के मैदानों के निवासी थे । जब वहॉ घास के मैदान सूख गये तो वे अपने मवेशियों के साथ पश्चिम को रवाना हुए । यहाँ के मूल निवासियों से इनका संघर्ष मी हुआ और धीरे धीरे उनसे वे मेल भी करते गये । इस समय अब्बासी खलिफाओं की हुकूमत थी । ये उनके अंगरक्षक बन गये । बगदाद इस्लाम संस्कृति का केन्द्र और ईरान कट्टर मुसलमानों का गढ बन चुका था । मध्य एशिया की अशान्त राजनीति ने खलिफाओं को तुर्कों के आश्रित बना दिया था, क्योंकि वे युद्ध करने में बड़े दक्ष और कुशल तीरंदाज होते थे । इनके अश्व बडे तीव्रगामी होते थे और ये चलते घोडों पर से चारों ओर तीरों की वर्षा कर सकत्ते थे । घोड़ा इनका प्रिय मवेशी होता था । वोड़े क्री चोरी करने वाले क्रो मौत की सजा निर्धारित थी । सिल्क रुट के समीप आ जाने के कारण ये भी व्यापार करने लगे थे । घोडों के व्यापार के साथ ये गुलामो का भी व्यापार काते थे । व्यापारी वर्ग में आने के साथ ये इस्लाम धर्म के भी कट्टर अनुयायी व उसके प्रसारक बन गये । गुलामों की बिक्री प्रतिदिन नियमित रूप से की जाती थी और तुर्कों सुल्तानों को भी गुलाम रखने का बडा चाव था । इस चाव को पूरा करने हेतु ही मुहम्मद गोरी ने निशापुर के काजी फखरुद्दीन अब्दुल अजीज कूकी से कुतुबुद्दीन ऐबक को खरीद लिया था । यल्दीज़ और कुबाचा भी गोरी के खरीदे हुए दास थे । इल्लुतमिश व बलबन भी अपने को दास कहते थे । परन्तु इस समय तक ये तुर्क भी कईं श्रेणियों में विभक्त हो चुके थे । जैसे मुइब्जी कृत्यों शम्मी, इल्वारी, बलबनी व मामलूक । दासों के साथ मालिक चाहे जैसा व्यवहार कर सकते थे, इनको चाहे जिसको बेच सकते थे । परन्तु मुहम्मद गोरी ने अपने गुलामों के साथ बुरा बर्ताव नहीं किया । उनको सरकारी उच्च पर्दो पर नियुक्त किया । गुलामों मेँ सर्वाधिक व विश्वसनीय कुतुबुद्दीन था । इसीलिए सुल्तान गोरी ने उसे गजनी लौटते समय ‘मलिक’ व. बली अहद के पद प्रदान कर दिए थे । औपचारिक रूप से उसे भारत में अपना वायसराय भी नियुक्त कर दिया था । इस श्रेणी के गुलाम मामलूक दास कहलाते हैं । ‘मामलूक’ अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ प्रो. सतोशचन्द्र ने इस प्रकार बताया है । ये दास वे होते थे जिनक्रो सुल्तान अपना बना लेते थे । उनके साथ दयनीय व्यवहार न करके उन्हें प्रशासनिक और सैनिक पद देते थे । घरेलूकाम उनसे नहीं लिए जाते थे । हम आगे चलकर देखेंगे कि कुतुबुद्दीन, इस्तुतमिश व बलबन घरेलूनौकर न होकर सुल्तान के -‘वलीअहद (उत्तराधिकारी) बने थे । इसी आधारपर 1206 से 1290 ईं. तक के सुल्तानों क्रो गुलाम शासक न कहकर मामलूक तुर्क या आदि तुर्क कहना ठीक रहेगा ।

इतिहासकार एबीएम. हबी बुल्लाह ने भी उन्हें मामलूक तुर्क लिखा है ।1 उन्होंने लिखा है कि भारतीय इतिहास में इस वंश को सामान्यत: गुलाम राजवंश’ के नाम से लिखा जाता है । लेकिन इस राजवंश के नौ शासकों में केवल तीन (कुतुबुद्दीन, इल्लुतमिश तथा बलबन) ने अपना राजनीतिक जीवन गुलामों की हैसियत से आरम्भ किया था, शेष छ: सुल्तान स्वतन्त्र थे । तीन सुल्तानों मेँ भी केवल ऐबक ऐसा सुल्तान था जो दासमुक्ति के उपरान्त सुल्तान बना था । इल्लुत्तमिश व बलबन सुल्तान बनने से पूर्व ही दासता से मुक्त हो चुके थे । इन सुल्तानों में से किसी ने भी दासता की अवस्था में राजसी पदक प्राप्त नहीं किया था । इसलिए इन तमाम सुल्तानों की श्रेणी को गुलाम शासकों की श्रेणी में गिनना उपयुक्त नहीं है ।1 यह तथ्य है कि ये तीनों (ऐबक्र, इस्तुतमिश और क्लबन) सुल्तानृ विभिन्न वंशों से थे । ठीक इसी समय इसी प्रकार की घटना मिस्त्र में घटी थी । वहॉ 1250 ईं. में तुर्कों ने अयुबीदो वंश को हटाकर अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी और आँटोमन विजय तक शठसन किया था ।2 मध्यकालीन इतिहासकार उन्हें मामलूके ही कहते हैं । एबीएम. हबीबुल्लम्ह ने भी इसकी की उत्पति अरबी भाषा के शब्द मामलक से ही बताई है और मामलूक़ का अर्थ बताया है अधिकार में रखना और यह कुरान के गुलाम शब्द पर ही आधारित माना है । अत: मामलूक्र शब्द मध्यकालीन मुस्लिम इतिहास में इतने दीर्घकाल से प्रयुक्त हो रहा था तथा इस शब्द को तेरहवीं सदी में भारत के तुर्क सुल्तानों के लिए भी मामलूक शब्द का दुयोग अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि गुलाम शब्द लम्बी दासता का प्रतीक होता ।

कुतुबुद्दीन ऐबक ही गुलाम वंश का संस्थापक था ? उपरोक्त अवतरण में गुलाम और मामलूक्र दोनों शब्दों के अर्थ को स्पष्ट कर दिया । गुलाम शब्द स्लैब का रूपान्तर है जिसका अर्थ है लम्बी गुलामी यानी लम्बे समय तक जो व्यक्ति अपने स्वामी के कठोर नियन्त्रण में रहते हुए दयनीय जीवन व्यतीत क्ररे । यह बात हम कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ नहीं पाते । कुतुबुद्दीन ऐबक्र तुर्कोंका निवासी था । उसके पिता क्री आर्थिक अवस्था दयनीय थी । अत: उसने अपने पुत्र को निशरुपुर के काजी फख़ल्दीन अब्दुल अजीज कूफी को बेच दिया । इस प्रकार ऐबक दासता का जीवन व्यतीत करने लगा । परन्तु ऐबक ने अपनी प्रतिभा व कुशाग्र-बुद्धि से काजी का दिल जीत लिया । परिणामत: काजी ने उसकी शिक्षा की उचित व्यवस्था का दी थी । काजी क्री अनुकम्पा से उसने घुड़सवारी, तीरंदाजी तथा रण-विद्या में अच्छी दक्षता पाली थी । उसे कुरान का भी अच्छा ज्ञान था । इसलिए उसे खाँ भी कहा जाता था । परन्तु अभाग्यवश काजी की असामयिक मृत्यु हो गईं और पुत्र ने ऐबक को एक व्यापारी को बेच दिया । व्यापारी उसे गजनी ले आया और गज़नी के बाजार में मानव पारखी मुहम्मद गोरी ने उसे खरीद लिया । सुल्तान की दासता में आते ही गुलाम ऐबक का भाग्य चमक उठा । उसकी स्वामी-भबित्त से रीझकर गोरी ने प्रथम उसे आखुर (घुडसवारों का अध्यक्ष) के पद पर नियुक्त कर दिया । तराइन के युद्धों में वह अपने स्वामी साथ था । उसकी वीरता से प्रसन्न हो गोरी ने उसे भारत से गज़नी लौटते समय पंजाब और अंतर्वेद का हाकिम नियुक्त कर दिया था । स्वामी की अनुपस्थिति में उसने अजमेर पर गोरी का प्रभुत्व बनाये रखा । 1194 ईं. में चन्दवार के युद्ध में उसने अपने स्वामी को जयचन्द के विरुद्ध विजयी बनाया । उसकी इन सेनिक अभियानों में रण८कुशलता को देखकर गोरी ने उसे अपना सेनापति नियुक्त कर दिया । खोखरों को परास्त कर 1205 ईं. में जब गोरी गजनी लौट रहा था तब उसे मलिक व क्ली-अहद (उत्तराधिकारी) को पदवियो से अलंकृत कर दिया था । इसकी पुष्टि इतिहासकार फ़खे मुदब्जिर भी करता है । अत: स्पष्ट है कि मुहम्मद गोरी के गुलामों व उच्चाधिकारियों में कुतुबुद्दीन ऐबक ही सर्वाधिक प्रभावशाली था । इतिहासकार हबीब व निजामी तो यहॉ तक कहते हैं कि गोरी इसे अपना उत्तराधिकारी भी नियुक्त कर जाता, यदि उसकी अचानक मृत्यु नहीं होती । अब हम स्वयं बिचार कर सकते हैँ कि ऐबक गोरी का वास्तविक गुलाम कब रहा ? गोरी की सेना में सेनापति तथा भारत में गोरी के साम्राज्य में वह वायसराय बन कर रहा और 1206 ई. में गोरी के मरने पर ऐबक भारत का सुल्तान बन गया । इस प्रकार देखा जाय तो ऐबक गुलाम वंश का संस्थापक नहीं वरम् दिल्ली सस्तनत का संस्थापक था । फिर भी कतिपय इतिहासकार इस कथन से सहमत नहीं हैं । फारसी इतिहासकारों ने दासों को ‘मुइब्जी‘, ‘कृस्वी‘, ‘शम्मी‘ व ‘बलबवीं’ वर्गों में विभक्त कर दिया है । आधुनिक लेखक उन्हें पठान, आराभिक तुर्क सुल्तान व इस्तारी वंश का मानते हैं । वास्तव में देखा जाय तो ऐबक अलग वंश का सुल्तान था तो इल्लुत्तमिश टू 1210-66 ईं.) अलग वंश का था । इसी प्रकार बलबन भी (1266-90 ईं.) अलग वंश का बताया जाता है । चाहे इन सुल्तानों के वंश बिभिन्न हों पर ये गुलाम नहीं थे, क्योंकि गद्दी पर बैठने से पूर्व ये सब दासता से मुक्त होकर उच्च पर्दो पर आसीन थे । ऐबक (1206-10 ईं.) को गोरी अपना भारत में वायसराय नियुक्त कर चुका था । ईस्तुत्तमिश सुल्तान बनने से पूर्व बदायूँ का गवर्नर था तो बलबन नासिरुद्दीन का (1246-66 ई.) प्रधानमंत्री था । अत: इतिहासकार इन्हें प्रारम्भिक तुर्क या आदि तुर्कों की श्रेणी में रखने को अधिक तर्क संगत समझते हैं । डॉ. ईश्वरी प्रसाद इन सुल्तानों को गुलामों की श्रेणी में रखने के पक्षधर हैं । उनका कहना है की इस वंश का नाम गुलाम ही इसलिए पडा कि 1206 ईं. से 1290 ईं. तक के सरि सुल्तान गुलाम थे । उन्होने ‘ऐबक’ शब्द का अर्थ ही गुलाम बताया है । वे आगे लिखते हैं कि कुतुबुद्दीन ऐबक नाम से सुल्तान बना और उसने एक नए शासक वंश की नीदे डाली जो इसके नाम (ऐबक) से विख्यात है । डॉ. एएल. श्रीवास्तव, डॉ. ईश्वरी प्रसाद के कथन से सहमत नहीं हैँ । उनका कहना है कि इक्तुतमिश व बलबन ऐबक के वंशज नहीं थे । इस्तुतमिश तो हल्वारी तुर्क था और बलबन ने भी अपने क्रो इल्यारी तुर्क ही माना है । परन्तु उसका दरबारी इतिहासकार पिनहाज-सिराज इससे सहमत नहीं है 1 इतिहासकार हबीब भी इसी प्रकार के विचार व्यवत्त करता है । वह लिखता है कि जब कुतुबुद्दीन क्रो दासता से मुवत्त कर दिया तो भारत के सारे गुलामों को दासता से मुक्त कर दिया । इसके अलावा उसने कहा, जब स्वामी ही नहीं तो गुलाम कहॉ से होंगे ? इसके अलावा कुतुबुद्दीन का पुत्र आरामशाह गुलाम नहीं था । इसी प्रकार इल्लुतमिश के उत्तराधिकारी और बलबन के उत्तराधिकारी गुलाम नहीं थे । अत: मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने उनको गुलाम वंशीय सुल्तान न मानकर आदितुर्क मानना अधिक न्याय संगत माना है और जब इसी प्रकार की समस्या उसी मध्यकाल में मिस्त्र में उत्पन्न हुईं तो वहाँ के शासक तुर्कों क्रो मामलूक तुर्क मान लिया तो दिल्ली सस्तनत के सुल्तानों को भी मामलूक्र तुर्क स्वीकार करना ही न्यायोचित होगा । कुतुबुद्दीन ऐबक्र को सुल्तान बन जाने के बाद गुलाम कहना ठीक नहीं । इसके अलावा मुहम्मद गोरी के भतीजे गयासुद्दीन महमूद ने उसे सुल्तान स्वीकार कर सुल्तान के सारे प्रतीक भेज दिए थे तथा 1208 ईं. मेँ खलीफा ने भी ऐबक को सुल्तान स्वीकार कर लिया था ।

Leave a Reply

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: