दुनिया के महान सेनापति नेपोलियन की दयाजनक मौत !

    बात कुछ पुराने समय की है और यूरोप की है ! उस समय में यूरोप आज की से बिल्कुल अलग था । स्वाभाविक है कि देश भी अलग होंगे ! रहाइन का समवायतंत्र , स्वतंत्र पर्शिया , वॉरसे राज्य , नेपल्स , ऑटोमन साम्राज्य जैसे देशों के नाम तो हमें बिल्कुल अनजान लगे क्योंकि आज इनमें से किसी साम्रज्य का अस्तित्व ही नहीं है ।
    पुरानी हकूमतों के स्थान पर बेल्जियम , जर्मनी , नेधरलेण्ड , पोलेंड , रोमानिया , स्लोवेकिया , चैक प्रजासत्ताक जैसे नए देश नई सीमा के मुताबिक बने है । सन 1810 के समय इन सभी देशों को अपने अंदर समा लेता एक बहुत बड़ा साम्रज्य बना हुआ था ।

और इसे बनाया था महान सेनापति नेपोलियन बोनापार्ट ने ! जरा सोचिए कितना विशाल साम्रज्य रहा होगा !

             महत्व के कहे जा सके 50 विजय पाकर नेपोलियन इस विशाल साम्राज्य बना पाया था । देखने की बात यह है कि जो साम्राज्य लाखों चौरस किलोमीटर तक फैला हुआ था उसे बनाने वाला नेपोलियन का जन्म सिर्फ 8684 चोरस किलोमीटर के कोर्सिका नाम के द्वीप पर हुआ था और उसकी रहस्यमय मौत जहाँ हुई वह द्वीप तो पूरे 125 चोरस किलोमीटर का भी नहीं था। अगस्त 15 , 1769 दिन हुआ नेपोलियन बोनापार्ट का जन्म गरीब परिवार में हुआ था और मौत 5 मे , 1821 के दिन ! वह भी ब्रिटन के नजरबंद कैदी की हालत में ग़ुलामी की अवस्था मे !

      इतिहास को बदल देनेवाला चक्रवर्ती सम्राट का आखिर में तो इतिहास के पास कुछ भी नहीं चला !
लेकिन जन्म और मौत के बीच के जो 52 साल का छोटा सा जीवन उसने इस तरह से जिया की उसे आज तक कोई भूल नहीं पाया ।
    उस समय अठारवीं सदी में फ्रेंच प्रजाजन आपखुद राजशाही के सामने आंदोलन चला रहे थे । सबसे घमंडी और जुल्मी राजा लुई 14 वा था । जिसने लोगो को भूखे मारकर अपने लिए वैभव के लिए दुनिया का सबसे आलीशान महल बनाया था। सन 1715 में उसकी मृत्यु के बाद लुई 15 वा फ्रांस के राजा बना तो उसके बाद सन 1774 में लुई 15 वा राजगद्दी पर बैठ गया ।
     नेपोलियन उस समय 5 साल का लड़का था । फ्रांस के दक्षिण मध्य समुद्र में कोर्सिका द्वीप के अजासियो नगर में उसका जन्मस्थान था । एक बात बहुत कम लोव जानते है कि नेपोलियन बोनापार्ट फ्रेंच नहीं था। कोर्सिका आज की तरह उस समय भी फ्रेंच हकूमत थी लेकिन कोर्सिका मतलब फ्रेंच नहीं । इटली के जिनोआ प्रांत के राजा अपने सूबेदार के द्वारा कोर्सिका पर राज चलाता था। राजा से छुटकारा पाने के लिए कोर्सिकजनों ने अंग्रेजो को द्वीप का वहीवट सौपने का निर्णय लिया। ब्रिटिश सरकार को लिखत अर्जी भी भेजी । लेकिन अंग्रेजो ने उसका स्वीकार नहीं किया ।
     क्योंकि अंग्रेजो को कोर्सिका के बदले भारत मे ज्यादा दिलचस्पी थी । ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव ने 1757 के प्लासी के युद्व जीत हासिल की थी। अब छोटे से कोर्सिका का वहीवट सम्भाल ने से अच्छा है कि उससे कई गुना बड़े और अनेक गुना मालदार भारत का वहीवट संभाल लिया जाय ( भारत की संपति को लूंट लिया जाए ) । ब्रिटिश हकूमत ने आनाकानी की इसलिए फ्रांस के जिनोआ के राजा ने कुछ सुवर्ण मुद्राओ के बदले में सन 1768 में कोर्सिका का वहीवट संभाल लिया ।
    इस परिवर्तन के दूसरे साल ही नेपोलियन का जन्म हुआ । इस तरह कानूनी रूप से फ्रांस के नागरिक के रूप में उसका जन्म हुआ अगर ब्रिटन के हाथ में उस समय कोर्सिका का वहीवट होता तो नेपोलियन फ्रांस के बदले ब्रिटन का भावि नागरिक कहलाता !
    फिर तो ब्रिटन के सामने युद्ध लड़ने का सवाल ही नहीं रहता । इतिहास में इसलिए शायद उसका शूरवीर योद्धा के रूप में उसका नाम शिलालेख की तरह भी कभी नहीं लिखा जाता ।
     लेकिन नेपोलियन मानो योद्धा बनने के लिए ही बना था। 9 साल का हुआ कि माता-पिता ने उसने फ्रांस की रॉयल मिलिट्री स्कूल में पढ़ने के लिए भेज दिया । हर विद्यार्थी को उस पाठशाला में दूसरे विषयों के साथ साथ लश्करी तालीम भी दी जाती थी । यहां पर नेपोलियन अकेला हो गया । ज्यादातर विद्यार्थी फ्रेंच थे जबकि खुद इटालियन भाषा बोलने वाला कोर्सिकन था । फ्रेंच में लिखना पढ़ना अभी तक वह पूरा नही सिख पाया था। केसी अजब बात है कि यही लड़का आगे जाकर पूरे फ्रांस का सम्राट होनेवाला था। इतना ही नहीं अनेक यूरोपी देश उस चक्रवर्ती हकूमत के ताबेदार बनने वाले थे ।
     पाठशाला में अकेला रहने वाले पढ़कर अपना समय बिताने लगा । ऐतिहासिक युद्ध के बारे में उसने पुस्तके पढ़ी । रोमन सम्राट जूलियस सिजर और ग्रीक सम्राट एलेक्जेंडर के फौजी साहस को पढ़कर उसने वह बहुत प्रभावित हुआ । और वह इतना प्रेरित हुआ कि उसने कि उसने स्कॉलर के बदले सिपाही बनने का निर्णय लिया । वैसे तो वह स्कॉलर भी था । गणित का पक्का अभ्यासी था । लेकिन युद्ध में ! कैसे ? वह कागज पर ही तोप , पैदल चलने वाले सैनिक , घुड़सवार सब के अंक जोड़कर अलग अलग व्यूहरचना करने में बहुत माहिर था । जो अंक होते तो काल्पनिक ही !

     अब ऐसा शौख जिस पर सवार होता है तब उसे महत्वाकांक्षा में तब्दील होने में देर नहीं लगती। नेपोलियन को कुछ असाधारण कर दिखाने की चटपटी सी लग गई। स्कूल का अभ्यास पूर्ण करने के बाद उसने पेरिस की मिलिट्री कॉलेज में दाखिला लिया । पैसों की लगातार कमी थी। बोले तो वान्धे थे।
      क्योंकि शाही सरकार सिर्फ उसके शिक्षण पुस्तकों का खर्च देती थी व्यक्तिगत कोई आमदनी ना होने की वजह से उसे स्कूल की कॉलेज के दिन भी गरीबी जैसे संजोग में में ही बिताने पड़े । जब छुट्टी मिलती तब थोड़े दिन अच्छी तरह से गुजरने के लिए वह कोर्सिका चला जाता था । नेपोलियन का बड़ा भाई और माता पिता अभी भी कोर्सिका में ही रहते थे । जहां का वातावरण राजा लुई के अत्याचारों को सहन करने वाले फ्रांस से बिल्कुल अलग था । फ्रांस में राजा के सामने चलने वाले आंदोलन की कोर्सिका में जरा भी असर नहीं हुई थी ।
       नेपोलियन सन 1785 में मिलिट्री कॉलेज का अभ्यास पूरा किया । तब लश्कर ने उसे लेफ्टिनेंट के पद पर रख लिया। वह होददा तो उसने संभाल लिया कोई भी एडवेंचर बिना उसे जीवन निष्क्रिय सा लगता था जो उसे रास नहीं आता था ।

  युद्ध के मैदान में लड़ने के बदले लष्करी छावनी में पड़ा रहना महत्वाकांक्षी युवाओं को कैसे पसंद आता ? लेकिन जब राजा का भविष्य खुद खराब जान पड़ता था वहां उसके लश्कर में नेपोलियन अपने अच्छे भविष्य की आशा कैसे रखता? प्रजा मरती थी , साहूकार उमराव और जागीरदार बेफाम लोगों का शोषण करते थे । वही लुई सोलहवा और उसकी रानी एन्तोइनेत ने अपनी बादशाही ठाठ भोगने में गुलतान थे। उनके वैभव का सारा खर्र्च मजदूरों पर किसानों पर मैसूल डालकर अत्याचार से वसूल करते थे । जो कोई भी विरोध का आवाज निकालता था उसे मौत की सजा दी जाती थी । सब पापों का घड़ा जब भर गया तब फ्रेंच क्रांतिकारीयो ने राजा रानी को पदभ्रष्ट कर के राजधानी पेरिस के नगर चौक में हजारों की भीड़ के सामने उनके सर कलम कर दिए गए ।

लुई 16 वे के बाद उसके बेटे लुई 17 वे को भी कठपुतली के रूप में गद्दी पर बिठाया गया। क्रांतिकारी खुद तो राजाशाही को पूरी तरह से खत्म कर देना चाहते थे , लेकिन यूरोप के कुछ बलवान देशों ने उनको धमकी देकर ऐसा करने से रोका । ऑस्ट्रिया , ब्रिटन , पर्शिया , स्पेन जैसे देशों का उसमें समावेश होता था । इन सभी देशों में राजाशाही थी । क्रांतिकारियों से बचकर जो फ्रेंच साहूकार उमराव और जागीरदार पहने हुए कपड़े लेकर भाग निकले थे वे सब इन देशों में छुप गए । इन देशों के राजाओ को अपनी बातों में उकसाया की फ्रेंच आम जनता के आंदोलन को कुचल डालो वरना यूरोप में से राजाशाही का युग खत्म हुआ समझ लो । हर एक राजा ने भी अपने देश में आंदोलन फुट निकलने का डर लगा और इसीलिए उन्होंने फ्रेंच क्रांतिकारी को धमकी दी । क्रांतिकारी हालांकि हिंसक मोड में थे । राजाशाही फ्रेंच ठेकेदारों को उन्होंने बारी-बारी से पकड़ कर कुल 17000 लोगों को गिलोटिन यंत्र की छूरी से मौत के घाट उतार दिए गए। उस दौरान आंत्रविग्रह भी जोर में चल रहा था । एक तरफ क्रांतिकारी और दूसरे तो राज दरबार के वफादार सैनिक जिनमें से एक नेपोलियन खुद था ।
     अब नेपोलियन की हालत जरा कफोड़ी बनी । अब इन दोनों में से किसका सा पक्ष लेना चाहिए , यह उसे तय करना था । मामूली लेफ्टिनेंट के बदले लश्कर के सेनापति का होददा पाना हो तो आंत्रविग्रह में विजेता बनने वाले पक्षी का ही पक्ष लेना चाहिए । विजय का पलड़ा तब क्रांतिकारों की ओर झुक रहा था । उस समय आकस्मिक उसे एक मौका मिला , जिसने उसका नसीब रातोंरात बदल दिया ।
क्रांतिकारी फ्रांस के तोलन शहर को बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहा था । क्रांतिकारियों के पास तोप तो थी लेकिन उसे इस्तेमाल करने वाले तोपची नहीं थे। नेपोलियन अचानक वहाँ से गुजर रहा था । इंसान यदि सही मायनों में महत्वाकांक्षी हो तो उसे सुनहरा मौका किसे कहते है , वह उस मौके को तुरंत भाप लेता है ।।
     इसलिए नेपोलियन ने भी तुरंत अपनी सेवा देने की तैयारी दिखाई । राजा के सैन्य पर गोलंदाजी करके थोड़े ही घंटों में शहर को जीत लिया गया ।
नेपोलियन की ज्वलंत कारकीर्दी का आरंभ उसी पराक्रम के साथ हुआ जिसमें नसीब का उसे बहुत ही साथ मिला । ब्रिटन , प्रशिया , ऑस्ट्रिया जैसे देशों ने फ्रांस के सामने युद्ध जाहिर किया । जो कि वास्तव में नेपोलियन का खुशनसीब था। क्योंकि उसमें उसने फिर से अपनी बहादुरी और बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करने का मौका मिलने वाला था । हमला करने में ऑस्ट्रिया सबसे आगे था । ऑस्ट्रियन फौज ने सबसे पहले फ्रांस के कब्जे का इटालियन प्रदेश ले लिया । ऑस्ट्रिया का साम्राज्य उस समय में बहुत शक्तिशाली माना जाता था । इसलिए जो प्रदेश उसने जीत लिया उसे हमेशा के लिए गया ऐसा समझकर फ्रांस की नई क्रांतिकारी सरकार ने उसके नाम पर चौकड़ी लगा दी । दूसरी तरफ ऑस्ट्रियन फौज आगे बढ़कर फ्रांस पर हमला न करें इसलिए वहां के सम्राट को शांतिसुलह का संदेशा भेजा गया ।
शांति की भाषा में शब्द रूप के साथ बात की जाए यह बात नेपोलियन को पसंद नहीं थी । शांति के लिए क्या भीख मांगनी पड़ेगी ? इससे तो अच्छा है कि शत्रु को ही शांत कर दिया जाए ! ऑस्ट्रियन फौजी बलवान थी , लेकिन युद्ध मैदान पर जीत मिलने के लिए अकेला बल इस्तेमाल करके काम नहीं चलता। कई तरह के दांवपेच भी अजमाने रहे और इस में नेपोलियन बहुत ही होशियार था । वास्तव में यही विषय उसका शौक का विषय था । इसलिए उसने रणनीति के कुछ प्लान बना लिए । क्रांतिकारी सरकार को उसने यह प्लान समझाया । 43, 000 सैनिकों का लश्कर पाया और पूर्व दिशा की ओर निकल पड़ा ।

इटाली पर कब्जा जमाने वाले ऑस्ट्रिया की फौज में 1,00, 000 सैनिक थे । लेकिन नेपोलियन के लिए इस विषय का कोई ज्यादा महत्व नहीं था । हरदिन 36 किलो मीटर का प्रवास करके उसका लश्कर ने मार्च 28 , सन 1769 के दिन इटली में प्रवेश किया । कोई सिद्धि को असत्य न मानने वाला सेनापति ने अपने सैनिकों का युद्ध के पहले आखरी संदेश देते हुये कहा , ‘ मैं जानता हूं कि पूरे रास्ते में तुम को अच्छी तरह से खाना भी नहीं मिला और ना ही आराम मिला । फ्रांस से अच्छे भले निकले हमारे सैन्य के 13000 सैनिक बीमारी या भुखमरी के कारण रास्ते मे ही मारे गए है । यह मैं जानता हूं , लेकिन अब समय आ गया है कि जब इटली के महानगरों को जीतने के लिए हम युद्ध करेंगे । मौत को सबसे पहला ललकार मैं देता हूं । सबसे पहले मैं मौत को ललकारता हूं । फिर भी मुझे पता है की हमारे नसीब में मौत नहीं , जीत है । ‘
सेनापति की खुद्दारी देखकर सैनिकों में नया जोश भर गया। सबसे आगे रहकर मरने के लिए तैयार हो ऐसा सेनापति को उन्होंने कभी नहीं देखा था । लगभग हर एक सैनिक के कपड़े मेले और फ़टे हुए थे । एक तरह से खाना ना मिलने के पर सैनिक का वजन घट गया था । कुछ सैनिक बीमार भी थे। इस हालत में तो ठंडी के सामने रक्षा देने वाले कपड़े और बीमारी को ठीक करने के लिए दवाइयां चाहिए । लेकिन नेपोलियन ने अपने जादू भरे शब्दों से इन तीनों चीजों की कमी भर दी ।
एक नदी के पास ऑस्ट्रेलियन फौज का आमना-सामना हुआ । खुली जगह में उसने पड़ाव डाला था । व्यूह र्चचना में लाजवाब युक्ति इस्तेमाल करने वाला नेपोलियन जानबूझकर अपने लश्कर को दो पहाड़ियों के बीच के मार्ग पर आगे ले आया । लश्कर कि 24 तोपों को उसने बिलकुल आगे रखकर दी और फिर एक साथ दागी । दूसरी ही मिनिट में फ्रेंच लश्कर ऑस्ट्रियन फौज की ओर बढ़े । उनकी संख्या का प्रमाण कम था। लेकिन दो पहाड़ों के बीच में रहकर निकलने वाले उनकी उनका बहुत समय में अंत ना आया , तब घबराए हुए दुश्मनों ने भगदड़ शुरू कर दी । अन्धाधुन्धी में कई लोग मारे गए । नेपोलियन की तोप ग्रेपशॉट प्रकार के गोले दागती थी । जो लोखंडी अंगूर के जैसे थे । गोले की लुगदी में कई सारे बारूद दबा दिया जाता था । तोप से निकलते ही हवा में जैसे वह गोला फटता , चारो ओर बारूद की बारिश हो जाती थी ।
इटली के प्रदेश को नेपोलियन ने जीत लिया । उस बात के संतोष मानने के बदले उसने ऑस्ट्रिया की ओर कूच शुरू रखी । बर्फीलीआल्प्स पर्वत माला को पार करके वह ऑस्ट्रेलिया पहुंचा । ऑस्ट्रिया की फौज को एक के बाद एक पराजय देकर उसे पीछे खदेड़ता गया। जब ऑस्ट्रिया का पार्टनर विएना सिर्फ 100 किलोमीटर दूर रहा तब उस देश ने सामने से चलकर नेपोलियन के पास शांतिसुलह की भीख मांगी । उसने इटली पर अपना हक को वापस कर दिया ।

    अब की ब्रिटन की बारी थी । फ्रांस में राजाशाही को वापस लाने के लिए ब्रिटेन अभी भी प्रयास कर रहा था । फ्रांस के सामने युद्ध लड़ रहे प्रशिया जैसे देशों को लष्करी खर्च के पैसे भी ब्रिटेन देता था । ब्रिटन की तिजोरी पैसों से छलकती होने का रहस्य सब जानते थे । ईस्ट इंडिया कंपनी भारत को लूट कर बेसुमार दौलत देती थी ।अंग्रेज भारत के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार भी चलाता था । माल की भूमि के रास्ते हेरफेर की जाती थी । इस हेरफेर का केंद्र था इजिप्त ! जहाँ पर जहाजो पर से काफिलों पर और काफिलों पर से जहाजो पर माल लादा जाता था । इस मार्ग की नाकाबंदी करने का नेपोलियन ने सोचा । सब कारोबार अगर बंद हो जाए तो फिर घर में बेकारी से ब्रिटन दूसरे देशों में अपनी चंचुपात करने का काम बंद करके अपना घर संभालना पड़ेगा ।
इजिप्त को जीत लेने का प्लान नेपोलियन ने जब फ्रेंच सरकार के सामने रखा कि तुरंत सरकार ने उसे मंजूरी दे दी । नेपोलियन की महत्वाकांक्षा सभी सदस्य पहचान गए थे ।यह सेनापति देश के बदले बाहरी प्रदेश में ज़्यादा समय गुजारे यह उनके लिए अच्छा था और एक युद्ध खराब तरह से हार जाए तो और अच्छा । एक बड़ी पराजय उसे फ्रेंच जनता की नजरों में गिरा दे। फिर फ्रांस के सेनापति में से सीधा सत्ताधीश बनना नामुमकिन !
इजिप्त में डंका बजाना यह बात नेपोलियन के बाएं हाथ का खेल था । यहां पर उसके 7000 सैनिकों को मामूलके के नाम से जाने जाते रेगिस्तानी 18000 घुड़सवार के सामने लड़ना पड़ा । जो मुख्य रूप से तलवार और भाले इस्तेमाल करते थे । इस युद्ध में हजारों मामूलक लोगों को सेना ने मार डाला । उसके सामने सिर्फ नेपोलियन के 30 सैनिक मारे गए । नेपोलियन की जीत के समाचार जानकार ब्रिटम चौक गया । भारत के साथ उसका व्यापारी संपर्क टूट जाए तो नुकसान तो होगा ही साथ ही फ्रेंच आगे चलकर भारत में प्रवेश कर जाए । वह अपने को भी भारत मे से निकाल दे इसकी कोई गारंटी नहीं थी । इसलिए ब्रिटन ने तुरंत अपने नौका सेनापति एडमिरल नेल्सन को बड़े काफिले के साथ भूमध्य समुद्र की ओर रवाना कर दिया । उसके नाइल नदी के किनारे के नजदीक पड़े हुए फ्रेंच मनवार और ब्रिटिश जहाजों के बीच युद्ध हुआ । नेपोलियन की मनवार डूब गई । इजिप्त उसे गवाना पड़ा । उसे वापस जाना पड़ा ।
फ्रांस की क्रांतिकारी सरकार का एक एक मोगेम्बो खुश हुआ । पराजित लश्कर के सेनापति को फ्रेंच प्रजा कभी स्वीकार नहीं करेगी । इसलिए सरकार के लिए नेपोलियन का भी डर गया । इजिप्त के मोर्चे पर फ्रांस हारा यह समाचार जानकर ऑस्ट्रियन फौज ने फिर से इटली को वापस जीत लिया । कोई दूसरा सेनापति होता एक साथ मिली दो निष्फलता से निराश होकर हार मान लेता , लेकिन नेपोलियन दूसरी मिट्टी का बना हुआ था ।
नेपोलियन फिर से ऑस्ट्रिया के सामने लड़ने के लिए निकला और फिर से जीता । इटालि का वह राजा हुआ , इतना ही नहीं लेकिन स्वदेश आने के बाद फ्रांस के सम्राट के रूप में 1804 में पेरिस की गद्दी पर बैठा । अब प्रजा उसके पक्ष में थी । सैनिक भी उससे वफादार रहते थे । नेपोलियन समग्र यूरोप पर राज करना चाहता था । सैनिक और प्रजा का साथ मिला इसलिए अब वह अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करना उसके लिए आसान बना । दूसरे साल लगभग 20 छोटे-मोटे युद्ध खेलकर यूरोप के कई महत्वपूर्ण देश और प्रदेश को उसने अपने राज्य के साम्राज्य में समा लिए ।
नेपोलियन कासपाटा देखते हुए रसिया जैसा ताकतवर साम्राज्य भी डर गया । यूरोप के बाद शायद उसकी बारी ना आ जाए । इसलिए फ्रेंच आगे कुछ को रोकने के लिए उसने और ऑस्ट्रिया के साथ मिलकर फैंस के सामने लष्करी मोर्चा खोला । रशियन ज़ार और ऑस्ट्रियन सम्राट के लश्कर एक साथ हो गए और इसलिए उनका संख्या बल हुआ : 402 तोप और 1,58,000 सैनिके ! लेकिन दुश्मन जिसका अंदाजा भी न लगा सके ऐसे दावपेच खेलने में माहिर नेपोलियन के दृढ़ मनोबल के सामने उनकी कोई औकात नहीं थी । दिसंबर 2 , 1805 की सुबह ऑस्ट्रिया में युद्ध शरू हो गया। शाम हुई तब तक 11000 रशियन और 2000 ऑस्ट्रेलियन सैनिकों के शव मैदान पर पड़ गए थे जबकि फ्रांस के शव सिर्फ 1300 थे । फ्रांस की विजय हुई । रसिया के झार को सेना को वापस बुला लेना पड़ा । जबकि ऑस्ट्रिया को फ्रांस के आधिपत्य स्वीकार करना पड़ा ।
फ्रेंच सेना फिर स्पेन पर घूम आई । सन 1810 में सबसे पहले जिन देशों व समर्ज्यो का नाम दिया गया है उन सब पर नेपोलियन की सत्ता के नीचे आ गई । सिर्फ दो देश बाकी रहे : ब्रिटन और रशिया !
नेपोलियन को आगे जाकर यही दो देश भारी पड़ने वाले थे। वह मूल तो ब्रिटन को हराना चाहता था । यह कम समुद्री आक्रमण से ही हो सकता था ।लेकिन दुर्भाग्य से ब्रिटिश नौका दल फ्रेंच नौका काफिले से शक्तिशाली था । परिणाम रशिया को जीतकर उस देश के भूमि रास्ते ही अंग्रेजों के भारत में पहुंचकर उसने तय किया । पश्चिम यूरोप का फ्रांस कहां और कहां पर पूर्वोत्तर एशिया और कहां दक्षिण का भारत । इस तरह का प्लान दूसरा सेनापति अगर बनाता तो खुद सैनिक हंस देते लेकिन नेपोलियन का आदेश पाकर 6,00,000 सैनिकों ने मान लिया ।
यह जंगी लश्कर ने जब जून 24 , 1812 के दिन रशियन सरहद पार करके उसमें 80000 घुड़सवार थे खुराक शस्त्र दारू गोला वगेरे सामान की अनेक बगिया थी । लगभग 30,000 घोड़े दो पहियों वाली तोपों को खींच रहे थे । रसिया के सरहद पर कोई चिड़िया भी नहीं दिख रही थी । क्योकि हमला करने के लिए रशियन फौज वहां पर हाजिर ही नहीं थी । लगभग छह लाख के प्रचंड लश्कर के सामने लड़ने के उसकी औकात ही नहीं थी । लेकिन इसमें रशिया के सेनापति मार्शल ने युक्ति का इस्तेमाल किया था । सरहदी विस्तार के सैनिकों को उसने सूचना दी थी कि दुश्मन जैसे जैसे आगे बढ़ता जाए वैसे वैसे पीछे हट करते रहना । लेकिन मार्ग में आने वाले दोनों तरफ के खेतों को जला देना । हर गांव को भी आग लगा देना। और रशियन सैनिको ने बिल्कुल यही किया ।
लड़ाई तो दूर रही । सिर्फ खाने पीने की कमी के कारण नेपोलियन के कई सैनिकों की मौत हो गई । साथ लाया गया सामान भी खत्म हो चुका था । इसलिए हजार सैनिकों का भोग दिया गया । इस कटोकटी में नेपोलियन के सभी लष्करी दांवपेच विफल रहे । दुश्मन के सामने लड़ना तो दूर वह कुदरत के सामने लाचार हो गया । भूखे और प्यासे बीमार उड़ते हुए सैनिकों की कुच थोड़ी धीमी हुई और आखिर में सितंबर उसका लश्कर रसिया की राजधानी मॉस्को के पास पहुंची ।
शरू में दरिया जैसे दिखने वाले लश्कर में अब कितने सैनिक बचे थे ? 6,00,000 नहीं सिर्फ 1,00,000 ! अब सेनापति मार्शल कुटुझोव का सैन्य पूछो अब मैदान में आया । खून भरा जंग शुरू हुआ । दिन ढला उसे पहले दोनों पक्षों में कुल मिलाकर 40,000 सैनिकों की मृत्यु हो गई । रशियन पीछे हटी । सितंबर 14 अक्टूबर , 1812 के दिन दोपहर 2:00 बजे विजेता के रूप में प्रवेश नेपोलियन मॉस्को में दाखिल हुआ । बहुत ही बड़ी परीक्षा आखिर पूरी हुई । अब मॉस्को कैसा था ?
नेपोलियन का मानना था कि शरणागति का पत्र के साथ रशियन यही उसका अभिवादन करने के लिए सामने आएंगे । लेकिन शहर बिल्कुल वीरान था । उस रात चारों आग लग गई और आग इमारत जलने लगी । राशियनो ने खुद मॉस्को को जला दिया था । 5 दिन मॉस्को जलता रहा । इस दौरान जार अलेक्जेंडर भीसेना को लेकर शरण मे आया नही।
नेपोलियन का गुस्सा समाया नहीं , लेकिन क्या करें । अक्टूबर महीना बैठ गया । मतलब रसिया की कठोर सर्दी का मौसम कब शुरू हो गया था । पहली हिमवर्षा भी शुरू हो गई ।
कातिल ठंड के बीच लंबे समय तक वहां पर रुका नहीं जा सकता था । नेपोलियन को वापस जाने का निर्णय लेना पड़ा । लेकिन अब वह वापस जाने वाला सफर बहुत लंबा था । वापिस जाने के सफर में बर्फीले तूफान लश्कर की हालत बिगाड़ते रहे । तापमान शून्य के नीचे 35 सेल्सियस तक जा पहुंचा था । हजारों घोड़े नरम बने बर्फ में दफन हो गए । तोप के पहिये बर्फ में धस गए । इसमें रशिया के सशस्त्र कोजाक योद्धा समय-समय पर नेपोलियन की सेना पर हमले करते रहे । भूख और प्यास ने उनकी हालत खराब कर दी । पराजित लश्कर जब आखिर में दिसंबर 14 अक्टूबर , 1812 के दिन फ्रांस पहुंचा तो उसमें सिर्फ 30000 सैनिक बचे थे ।
नेपोलियन इस पराजय का क्या खुलासा देता ? खुलासा देने के बदले फ्रांस का सम्राट पद ही छोड़ के कोई निर्णय ले उससे पहले ब्रिटेन रसिया पर्शिया और ऑस्ट्रिया के लश्कर फ्रांस आ धमके । पेरिस को जीत लिया गया । नेपोलियन को कैद पकड़ा गया और इटली के किनारे नजदीक एल्बा द्वीप पर उसे भेज दिया गया । हमेशा लिए देश निकाल दिया गया ।
दुनिया का महान सेनापति ये सजा कैसे सहन कर कर लेता ? एक बार मौका देखा और भागा और बेल्जियम पहुंचा । विदेशी आक्रमण होने के कारण कई फ्रेंच सैनिक बेल्जियम भाग गए थे। नेपोलियन को उनका साथ मिला । उसने नया लश्कर बनाया और बेल्जियम के वाटरलू में ब्रिटन के सामने फिर से युद्ध शरु कर दिया । ब्रिटिश फौज के सेनापति ड्यूक ऑफ वेलीगटन को ललकारा । ये वही ड्यूक था जिसने सन 1799 रोज श्रीरंगपट्टनम युद्ध में टीपू सुल्तान को हराया था ।
वोटरलू के युध्द में दोनों पक्ष में कुल मिलाकर एक लाख सैनिक , 28000 घुड़सवार और 13000 तोपची थे । तोपे सब मिलकर 400 थी । ऐतिहासिक दिनांक रही : जून 5 , सन 1815 !
पहले 50 युद्ध खेल कर लगभग पूरा यूरोप जीत लेने वाला नेपोलियन उस आखरी युद्ध मे हार गया । ब्रिटन को उसे शरणागति का पत्र लिखना पड़ा । कई बार वह हार कर वापस जीता था , अब इस बार ऐसा ना हो इस बात को ध्यान में रखकर ब्रिटन ने उसे एटलांटिक महासागर के सेंट हेलेना द्वीप पर बाकी बचा जीवन बिताने के लिए भेज दिया ।

      सिर्फ 122 चोरस किलोमीटर का द्वीप उसके जीवन का आखरी मकाम बना । बिल्कुल अशक्य चीज को शक्य बनाने वाले नेपोलियन को ब्रिटन ज्यादा जिंदा नहीं रखना चाहता था । इसलिए अंग्रेज जेलर हर दिन खाने में थोड़ा थोड़ा जहर देते रहे । हररोज का जहर का थोड़ा थोड़ा डोज लंबे समय के बाद प्राणघातक बना । साढ़े पांच साल बाद , मे 5 , 1821 के दिन 52 साल की उम्र में उसकी मौत हो गई । इतिहास के यादगार प्रकरण का भी उसी के साथ हुआ अंत !

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