बर्म्युडा ट्रायंगल की अब तक की सबसे रहस्यमई और जानलेवा सत्य घटना !

बर्म्युडा ट्रायंगल की अब तक की सबसे रहस्यमई और जानलेवा सत्य घटना !

बर्म्युडा ट्रायंगल की अब तक की सबसे रहस्यमई और जानलेवा सत्य घटना !

दिसम्बर 5 , 1945 का दिन और समय दोपहर का ! फ्लोरिडा राज्य का पूर्वी किनारा जहां पर समुद्र तट पर फोर्ट लॉडरडेल नाम का हवाई मथक स्थित है । यह हवाई मथक एरफोर्स का नहीं है । बल्कि अमेरिका के नौका दल का है । विमान वाहक जहाज के तूतक पर से टेकऑफ और लेंडिंग कर सके ऐसे कई सारे फाइटर विमान यहां पर लंबी कतार में पड़े रहते हैं । कई बार विमान रनवे पर दौड़कर आकाश में उड़ जाते हैं और लंबे राउंड लगाने के लिए अटलांटिक महासागर की ओर चले जाते हैं , और थोड़ी देर बाद वापस यहीं पर आ जाते हैं । ऐसी एक टुकड़ी वापस आने के बाद तुरंत दूसरी टुकडी रवाना हो जाती है । इसलिए फोर्ट लोडरडेल पर विमानों का ट्राफिक कभी भी रुकता नहीं । विमानों की आवन जावन चलती रहती है ।

लेकिन आज कुछ असाधारण बनने वाला था । नौका दल के बड़े से बड़े अफसर भी जिसका रहस्य नहीं समझ सके ऐसा अकस्मात आज होने जा रहा था। उस रहस्यमय घटना को अब ज्यादा देर नहीं थी । क्योंकि अवेंजर प्रकार के कुल 5 टोरपीडो बॉम्बर विमान ने आकाश में उड़ने के लिए अपने प्रोपैर शुरू कर दिए थे । विमानों के दल के कप्तान लेफ्टिनेंट चार्ल्स टेइलर बाकी के 4 विमानों को हुक्म देते हैं कि , ‘ रनवे के आखिरी छोर पर 5 किलोमीटर की स्पीड से आगे बढ़ो ! हर कप्तान अपना क्रम बनाए रखें और मेरे पीछे आए ! ‘

यह पांच फाइटर बॉम्बर क्या अमेरिका के दुश्मन पर हमला करने वाले थे ? नहीं ऐसा कुछ नहीं था । दूसरा विश्व युद्ध पूरा हुए 3 महीने बीत चुके थे । युद्ध में जापान इटली और जर्मनी बहुत खराब रूप से हार गए । अब अमरीका को थोड़ा भी डर नहीं है । कोई दूसरा दुश्मन रहा ही नहीं । दुनिया भर में अमेरिका का डंका बजता है तो फ़िर फ्लोरिडा राज्य के बॉर्डर पर लड़ाकु विमानों की इतनी ज्यादा आवन जावन का रहस्य क्या था ?

वह कौन सा कारण कारण था ? वह कारण यह था कि 4 वर्ष के दौरान अमेरिका के कई सारे पायलट युद्ध में मारे गए थे । अब उनकी खाली पड़ी जगह को पूरी करने के लिए नए पायलटों की भर्ती की जा रही थी और हर दिन उनको फ्लाइंग की तालीम दी जा रही थी । दुश्मन के सामने तुरंत लड़ना हो तो नौका दल का अपटूडेट होना आवश्यक है । इसलिए अमेरिकन नौका दल ने फोर्ट लोडरडेल को अपना तालीम केंद्र बनाया था । नए पायलट दिन-रात तालीम लेते थे । कभी-कभी उन्हें दिशा शोधन की कला सिखाई जाती थी , तो कभी बमबारी करने की , तो कभी कभी दुश्मन विमान से आकाशी डॉग फाइट के दावपेंच के नुस्खे भी उनको सिखाए जाते थे । ये सारी विमान कवायत अटलांटिक समुद्र पर की जाती थी । समंदर का युद्ध मैदान मतलब सिर्फ समंदर ! जमीन नहीं ! इसलिए नए पायलट को वही ट्रेन करना चाहिए ।

पांच एवेंजर विमान फोर्ट लोडरडेल के वातावरण में बड़ी आवाज कर रहे थे । हर प्लेन बम से लदे थे । तो फ़्यूजलेज की खाली जगह में भी एक-एक टोरपीडो भी रखा गया था । आज के जेट फाइटर के सामने आज तो एवेंजर बिल्कुल चिड़िया लगे लेकिन उस समय इन विमानों का जवाब नहीं था । अमेरिका के दूसरे विश्व युद्ध में समुद्र के मोर्चे पर अमरीका को जो सफलता मिली उसमें एवेंजर विमानों का बहुत बड़ा हिस्सा था । यह विमान मजबूत और शक्तिशाली थे । अगर अमेरिका के पास ये विमान ना होते तो खास कर जापान के साथ प्रशांत महासागर में युद्ध में अमरीका जीत न पाता ।

घड़ी में दोपहर के 2:10 हुए हैं । कंट्रोल टावर का संदेश टुकड़ी के कप्तान लेफ्टिनेंट चार्ल्स टेइलर को उनके इयरफोन में सुनाई देता है । अब तुम एक साथ टेक ऑफ कर सकते हो । तुम्हारी रिस्ट वॉच जांच लो अभी 2:30 हुए हैं ।

‘ टेक ऑफ करो ! ‘ टेलर उसके साथीं विमानों को वायरलेस पर सूचना देता है । पहले टेइलर का विमान दौड़ लगाता है और उसके पीछे दो दो की जोड़ी में चार विमान दौड़ पड़ते हैं , और पांचो विमान आकाश में उड़ जाते हैं ।

एक ही प्रोपेलर होने के बावजूद इन विमान की स्पीड गजब थी। 432 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से की पूर्व की ओर चल पड़ता है । लगभग 1600 किलोमीटर दूर का प्रवास करके वापस आया जा सके इतना इंधन उनकी टंकी में भरा हुआ है । जैसे युद्ध में भाग लेना हो इतना सामान उसमें लगा हुआ है । 5 मशीन गन है । छोटे-बड़े मिलकर 900 किलोग्राम के बम है । एक टोरपीडो है , जिसका वजन 867 किलोग्राम है । इन सभी वस्तुओं को यूं ही नहीं उसमें बिठाया गया । अमेरिकन नौकादल ने अटलांटिक महासागर में थोड़ी दूर एक डमी जहाज को तैरता हुआ रखा है । उस पर निशान बाजी की प्रैक्टिस कर सके , उसे ढूंढकर उस शस्त्रो की मदद से उसकी धज्जियां उड़ा देनी है ।

यह काम लेफ्टिनेंट चार्ल्स टेइलर का या फिर दूसरे बाहोश पायलट का नहीं है । निशान पर सिर्फ नए सीखने वाले पायलट को ही वार करना है ।

सीखने वाले पायलट कितने थे ? हर एवेंजर में एक ट्रेनर और दो सीखने वाले इस तरह से तीन लोग थे । पांच एवेंजर में सब मिलकर 14 लोग थे। 14 इसलिए कि एक सीखने वाला पायलट ड्यूटी पर हाजिर नही हो पाया था । उसका नाम था : एलन कोसनर ! अगले दिन फ्लाइट 19 ने नाम से जाने जाती कवायत में शामिल होने की सूचना दी जाने के बावजूद वह एब्सन्स था । शायद नसीब उसके पक्ष में था !

‘ लेफ्टिनेंट टेइलर कॉलिंग ! ‘ टेक ऑफ के तुरंर बाद फ्लाइट 19 के कप्तान लेफ्टिनेंट टेइलर ने उसकी बाजू में उड़ रहे बाकी जब चार विमानों को संदेशा प्रसारित किया। ‘ आप का फ्लाइट प्लान एक बार फर जांच ले । तालीम लेनेवाले पायलट को खास कहना चाहता हु की वे ठीक से प्लान को समझ ले । ‘

यह सूचना इस लिए देनी पडी की उसका कारण थ था कि फ्लाइट प्लान थोड़ा विचित्र था। थोड़ा अटपटा और उटपटांग था । अब प्लान अटपटा ना हो तो तालीम लेने वाले पायलट काबिल कैसे बनते ! पांच एवेंजर विमान को पहले 91 ° पूरब में 90 किलोमीटर तक आगे बढ़ना था। उतना अंतर तय करने के बाद वे चिकन शॉल्स नाम के समंदर में उनको डमी जहाज मिलता जिसको उन्हें डुबोना था। उसके बाद 91° पूर्व में आकाश सफर शरू रखकर दूसरे 107 किलोमीटर का अंतर तय करना था । विमानों को उसके बाद 346° का कोण बनाकर उत्तर की ओर 117 किलोमीटर का सफर तय करके आखिर के 241° के कोण पर दक्षिण पश्चिम दिशा में मुड़कर वापस फोर्ट लोडरडेल आ जाना था । जब के बाद तुरंत संदेश अग्रसारित किया तुम्हारा फ्लाइट प्लान फिर से जांच लो तारिणी पायलट को खास बताना है कि वह इस प्लान को पूरा पर ठीक से समझ अटपटा प्लांट ना हो तो सीखने वाले पांच एवेंजर विमानों ने सबसे पहले 91 वर्ष पूर्व पूर्व में दिमाग इतना अंतर काट ले इतने में चिकन सोर्स नाम के शिक्षा रे हवाई जहाज उनको देखने को मिले जिसे डूबने के बाद 91 पूर्व दिशा में विमान को उसके बाद 346 डिग्री के कोण पर उत्तर तरफ मोड़ लेना था और 117 किलोमीटर का अंतर काटना था आखिर में 241 अंश के कोण पर के बाद दक्षिण पश्चिम दिशा में 192 किलोमीटर का सफर करके वापस पहुंचना था ।

अब बात ये है कि फ्लाइट 19 का फ्लाइट प्लान त्रिकोण आकार का था । एटलांटिक महासागर के नक्शा पर आप इनका प्रवास मार्ग को खिंचे तो यह छोटा सा त्रिकोण बनता था । भूल जाओ उस छोटे त्रिकोण को । क्योंकि हम यहाँ बड़े वाले त्रिकोण की बात करने वाले है । जिसे बर्म्युडा त्रिकोण यानी ट्र्यान्गेल कहा जाता है । अब होश उड़ गए ना ? क्योकि ये वही बर्म्युडा ट्रायंगेल है जिसे मौत का , रहस्य का , काल का जानलेवा , खतरनाक और ना जाने किन किन शब्दो का प्रयोग किया जाता है । लेकिन मूल बात ये है कि बर्म्युडा का ट्रायंगेल विमान और जहाज के लिए सलामत नहीं है । लेकिन कुछ लोग कहते है की क्या दूसरे समंदर में जहाज डूबते नही क्या ? विमान नहीं टूट पड़ते ? होता है । सब जगह होता है । अब उसमें बर्म्युडा ट्रायंगेल का दोष हम क्यों निकालते है ? बात भी सही है । लेकिन बात इतनी सीधी भी नहीं है मेरे भाई !

क्योकि आज भी बर्म्युडा ट्रायंगेल का नाम सुनते ही अच्छे अच्छे नाविक और पायलट की सांस हलक में अटक जाती है । ये यू ही नहीं ! आज तक इस मौत के ट्र्यान्गेल में सेकंडों जहाज और विमान डूब चुके है । 1200 जितने पायलट और नाविक भी समाधि ले चुके है , जबरस्ती ! दूसरे समुद्र में भी इतनी जानलेवा अकस्मात अचूक होते हैं , लेकिन बरमूडा ट्राएंगल की बात ही अलग है । ज्यादातर अकस्मात रहस्यमय तरीके से होते हैं । विमान इतनी जल्दी समुद्र में टूट पड़े है कि उनको कंट्रोल टावर को संदेशा भी नहीं भेज पाते । दूसरे समंदर में तो पायलट को सन्देशा भेजने का समय मिलता है, टूटे विमान का भंगार भी मिलता है । जहाज घंटो को तैरता रहता है। लेकिन डूबते जहाज के रेडियो ऑपरेटर को मान ले कि संदेशा मिलने का समय न रहा हो तो भी विमान का थोड़ा ज्यादा हिस्सा समुद्र पर तैरता रहता है । जहाज भी डूबने में कभी कभी एकाध घंटा निकल जाता है डूबता हुआ जहाज का रेडियो ऑपरेटर उसके वायरलेस का संदेश प्रसारित न कर सके ऐसा तो हो ही नहीं सकता । मान लीजिए कि यह संदेश प्रसारित करने का भी समय मिला हो तो जिस जगह जहाज डूबता है , वहां पर उसके भंगार , तैल का धब्बा और दूसरे अवशेष दिखे बिना नहीं रहते । लेकिन बर्म्युडा ट्रायंगेल में तो इनमें से किसी भी चीज का कोई भी अवशेष तक हाथ नहीं लगा ।

अब बात करते है फ्लाइट 19 की तो उसके पांच एवेंजर समुद्र के आकाश में आगे बढ़ गए थे । उर आकाश और नीचे समंदर , जमीन कहीं भी दिख नहीं रही थी । इसलिए टुकड़ी कहां तक और कितनी दूर पहुंची यह तो हम आंखों से देखी नहीं सकते । नदी जंगल या मैदान जैसे इलाके हो तो पायलट उसके स्थान का थोड़ा बहुत ख्याल तो उसे आता है । लेकिन यहां पर तो इनमें से कुछ भी नहीं था । चारों और सिर्फ शांत समुद्र बिछा हुआ था । जिसका आसमानी पानी दोपहर की धूप में चमक रहा था । समुंदर एक जगह जैसा हो वैसा ही दूसरी जगह में दिखाई देता है । इसलिए समुंदर में आकाश में विमानों का भौगोलिक स्थान तय करने में बहुत ही मुश्किल आती है ।

लेकिन एवेंजर्स जैसे उन्होंने यह मुश्किल नहीं थी । समंदर के प्रवास के लिए ही उन्हें बनाया गया था । इसलिए उसका बांधकाम बहुत ही मजबूत था । इंजन भी इतना मजबूत कि वह कभी फेल नहीं हो सकता था और प्लेन में शक्तिशाली वायरलेस था । जिसकी मदद से अलग अलग तरह की फ्रीक्वेंसी ओर से सन्देशा भेजा जा सकता था । एक फ्रीक्वेंसी काम न करे तो दूसरी फ्रीक्वेंसी और दूसरी काम न करे तो तीसरी ! मतलब वायरलेस का जोखिम भी नहीं था ।दिशा ढूंढने के लिए होकायंत्र और जायरोस्कोप का भी इंतजाम किया गया था ।

हवाई मथक का रेडियोसंकेत को पाने वाला एक अलग रिसीवर भी उसमें रखा गया था । इस रिसीवर में संदेशे की दिशा में जैसे जैसे पायलट आगे बढ़ता वैसे वैसे उसे ज्यादा ऊंची आवाज में सन्देशा मिलता । एक तरह से कहे तो पायलट उसी दिशा में आगे बढ़े जिस दिशा में आवाज बड़ा होता हो फिर तो दिशा भूलने का कोई प्रश्न ही नहीं था । विमान की फ्यूल टैंक भी बहुत बड़ी थी । जरूरत से ज्यादा बंधन उसने भरा जा सकता था । विमान मान लो की दिशा भूल जाए और रास्ता ढूंढने के लिए उसे इधर उधर उड़ना पड़े तब भी फ्यूल टैंक खत्म होने वाली नही थी । अगर आखिर में इंधन खत्म हो जाए और विमान समुद्र में टूट पड़े तो पायलट को बचाने के लिए उसमें रबर की एक नाव भी रखी हुई थी । उस नाव का वाल्व इस तरह का था कि जैसे समुद्र का पानी उसे छुए की नाव में अपने आप हवा अभर जाये । ना वह नाव डूबे ना ही उसमें बैठे पायलट ! और तो और पांच एवेंजर के 14 पायलट के लिए एक एक पेरेशूट थी । अब अकस्मात की इतनी तैयारी की हो तो डर कैसा ? विमान का तो जो होना हो वह हो लेकिन पायलट सलामत रहे !

लेफ्टिनेंट चार्ल्स के पांच एवेंजर 25 मिंट के बाद चिकन शॉल्स पहुंच गए । अमरीकी नौकादल ने एक डमी जहाज को वहां रखा था। जिस पर विमानों को हमला करना था । चिकन शॉल्स का स्थान नक्शे में देख ले ! हवाई टुकड़ी के विमान लंबे प्रवास करते हैं तब वे कहां पर है ? आसपास हवामान कैसा है ? प्रवास कितनी स्पीड से हो रहा है ? इन सबका रिपोर्ट उन्हें कंट्रोल रूम को देना होता है। विमान अगर कंट्रोल टावर के सम्पर्क में न रहे और उस दौरान कुछ होता है तो मदद के लिए वे कुछ नहीं कर सकते ! जब मालूम न हो कि मदद कहा करनी है तो विशाल एटलांटिक महासागर में किसको भेजे और कहा भेजे ?

लेकिन लेफ्टिनेंट को प्रवास के दौरान सीखने पायलट को बहुत सारी बाते सलाह देनी थी । हर विमान में उसके जैसा एक ट्रैनर पायलट था । जरूरत पड़े उनको भी वह सलाह देता था। ये सब पहले से तय था । इसलिए शरू शरू में वे सब कंट्रोल टावर से सम्पर्क नहीं करने वाले थे। कंट्रोल टावर भी उनसे कुछ पूछने वाला नहीं था ।

उन्होंने उस डमी जहाज को ढूंढ लिया । बारी बारी उस पर बमबारी की गई । टॉरपीडो भी उस पर छोड़े गए । सीखने वाले पायलट ने शायद तोप से भी निशानेबाजी की प्रैक्टिस की ।

शायद ? शायद या फिर सही मायनों में प्रैक्टिस की कौन जाने , लेकिन एवेंजर विमानों ने उस समय के लिए कंट्रोल टावर के साथ संपर्क को काट दिया था । अब उन्होंने किस तरह उस जहाज के चिथड़े उड़ाए ये तो कंट्रोल टावर को भी मालूम नहीं था। सब वापस आकर रिपोर्ट देंगे तभी उनको मालूम होगा । तब तक कंट्रोल टावर के अफसरों को राह देखनी थी। थोड़ी मिनट में फिर भी वायरलेस का मैसेज मिलने ही वाला था।

इस लिए सब कंट्रोल टावर में सब ऑपरेटर बिल्कुल शांति से बैठे थे । चिंता करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी । जिस रास्ते से वे सब गए थे उसी रास्ते से के दूसरे विमानों ने भी प्रवास किया था और उन सब पायलट के मुताबिक एटलांटिक महासागर का हवामान बिल्कुल शांत था । हवा तेज नही थी। आकाश भी एकदम साफ साफ था। सर्दी होने के कारण समुद्र में लहरे भी नहीं उठ रही थी। और सबसे बड़ी बात ये की लेफ्टिनेंट चार्ल्स काफी अनुभवी पायलट था। उसे 2500 घण्टे हवा में उड़ने का अनुभव था । कई तरह के विमान को उसने उड़ाया था । दूसरे चार एवेंजर के पायलट को भी अच्छा खासा अनुभव था।

एक घंटा बीत गया । कंट्रोल टावर की घड़ी में 3:10 का समय बताया तो वायरल के पास बैठे मुख्य ऑपरेटर को अपने साथीदार से कहा विमान को वापस आने का समय हो गया है ।

‘ लेफ्टिनेंट चार्ल्स टेइलर अभी तक हमारा संपर्क क्यों नहीं किया ? ‘

ऑपरेटर ने अपना रिसीवर चालू ही रखा था । कान पर इयरफोन पहन कर वह मेसेज का इंतजार कर रहा था।

‘ एफ टी – 28 ! क्या आपको मेरी आवाज सुनाई दे रही है ? ‘ उसने पूछा । लेफ्टिनेंट टेइलर के एवेंजर का नाम एफ टी 28 था । इसलिए ऑपरेटर ने उसी नाम से सन्देशा भेजा ।

कोई जवाब नहीं मिला । यह बात कुछ हजम नहीं हुई , क्योंकि एवेंजर विमान तो कब के वापस मुड़ गए होगे और उनको अब अपने आने का समाचार देना चाहिए । एक छोटा सा भी मैसेज भेजने का उन्हें क्यों नहीं भेजा ?

मैसेज की राह देखते देखते 3:45 बजने वाले थे ।

मतलब विमानों को अपने सफर पर निकले हुए डेढ़ घंटा बीत चुका था । विमानों ने कुल मिलाकर 500 किलोमीटर का अंतर काटना था । अब एक घण्टे के 432 किलोमीटर की स्पीड से उड़ने वाले एवेंजर विमासन के लिए ये बहुत आम बात थी । लेकिन ?????

अभी तक मेसेज आया क्यों नहीं ? अब तो 2 घंटे के समय में वे तो विमान वापस आ जाने चाहिए थे । लेकिन आये नहीं ! हुआ क्या ? क्या विमान गलत दिशा में तो नहीं चले गए या फिर चिकन सॉस के पहले डमी जहाज को डुबोने के समय कोई अकस्मात हो गया ? वे खो तो नहीं सकते क्योंकि हर विमान में दिशा शोधक यंत्र लगे हुए थे । एक विमान का यंत्र बिगड़ सकता था तो दूसरे विमान के यंत्र सही दिशा बताता , लेकिन उसकी भी टावर को यांत्रिक खराबी का समाचार देता । लेकिन अभी तक …..

तभी एक ऐसा ही मेसेज आया ! ठीक 3:45 मिनट पर !

‘ कॉलिंग कंट्रोल टावर ! हम सब मुश्किल में पड़ गए हैं । रास्ता भूल गए हैं हमें जमीन दिखाई नहीं दे रही। । आप सुन रहे हैं ? ‘

‘ लेकिन आप हो कहा ? ‘ कंट्रोल टावर के ऑपरेटर ने तुरंत पूछा !

‘ वो भी हम नही जानते । ‘लेफ्टिनेंट टेइलर ने कहा ।

‘ हम अपना स्थान तय नहीं कर पा रहे । हम खो गए है । ‘

‘आप पश्चिम की ओर आगे बढ़ते रहिये। ‘

‘ पश्चिम दिशा किस ऒर है ? वह भी हम तय नहीं कर पा रहे । सब विचित्र लगता हैं। कुछ समझ मे नहीं आ रहा । समंदर भी समंदर जैसा नहीं लगता ? ‘.

लेफ्टिनेंट चार्ल्स ने गभराये हुई आवाज में कहा !

कंट्रोल टावर में भी डर का माहौल फैल गया । क्योंकि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था । टावर के सब ऑपरेटर इकट्ठा हो गए । क्या हुआ , क्या हो सकता है इसका अंदाजा लगाने लगे । अगर के आकाश में चुंबकीय तूफानों हुआ हो तो ऐसा हो सकता है । क्योंकि उस समय पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र बिगड़ जाता है या फिर थोड़ी देर के मिट लिए जाता है । उससमय लेकिन होका यंत्र काम ना दे तो क्या हुआ ? पश्चिम दिशा यंत्र की मदद बिना भी ढूंढी जा सकती है । दोपहर का समय बीत गया । 3:45 बज रहे हैं स्वाभाविक बात है कि सूर्य अब पश्चिम की ओर होगा । बस सूर्य की दिशा की ओर ही बढ़ता जाना था। आखिर में वे सब बड़ी आसानी से फोर्ट लोडरडेल पहुंच सकते थे।

अगर वे फोर्ट लोडरडेल के बदले कही और दूसरे किनारे पर पहुंच जाए तो भी क्या बात थी ? विमान तब भी सलामत रहते क्योंकि अमरीका ने बाकी का मार्गदर्शन देने के लिए काफी अच्छी सहायता रखी थी। फ्लोरिडा के मायामी शहर के पास अमरीकन नौकादल का एक सेंट्रल टावर था । एरपोर्ट भी था ।उत्तर में नौकादल का बनाना रिवर एयर स्टेशन नाम म एक सेंटर था । फोर्ट लोडरडेल के उत्तर में पोर्ट एवर्गलेज्ड नाम की बहुत बड़ी अमरीकन छावनी थी । इस के रन वे नजदीक बहुत शक्तिशाली रेडार और वायरलैस के केंद्र थे । कोई एरोप्लेन रास्ता भटक जाए तो वे वहां बैठे बैठे ही उसे वायरलेस से बात कर सकता था कि भाई इधर कहा चले आ रहे हो । अपना रास्ता देखो ।आपका रास्ता उधर है तो अपने हेंडल को जरा उधर घुमाइए भैया !

फ्लोरिडा के दक्षिण में किझ नाम के द्वीप थे। वह भी कतार में ! अब बोलो कोई तकलीफ थी ! अगर एवेंजर विमान कही पर भी जाते तो मदद। तैयार थी । बस वे वहां पहुंचने चाहिए !!!

लेकिन उसके लिए उनको पश्चिम में उड़ना चाहिए । लेकिन उस दिशा में उड़ने की सुजबुज उनको थी नही ! फोर्ट लोडरडेल के ऑपरेटर समज गए कि एवेंजर टुकड़ी को सूर्य ही नहीं दिख रहा था । यह अजब बात थी । क्योंकि आकाश तो साफ था । सूर्य दिखना ही चाहिए लेकिन ….

एक दूसरी विचित्र घटना उस दौरान हुई !

कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त ! ……

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