राजपूतों की पराजय

राजपूतों की पराजय

मुसलमानों की भारत बिजय तथा उनको इस कार्य में मिली असाधारण सफलता कोई साधारण ऐतिहासिक घटना नहीं थी । पृथ्वीराज चौहान भारत का अन्तिम हिन्दू सम्राट था जो अपनी शूरता व वीरता के लिए उत्तरी भारत में प्रख्यात था । अत: उसकी पराजय भारत के इतिहास में कोई साधारण पराजय नहीं थी । उसकी पराजय से हिन्दू साम्राज्य की स्थापना का विचार सदा के लिए स्थगित हो गया । हम यह भी जानते हैं कि राजपूत ऐसे वीर तथा दुधर्ष योद्धा होते थे जो समर भूमि में मृत्यु का आलिगन काना ही स्वर्ग जाने का सोपान समझते थे । देश भी सब प्रकार से साधन सम्पन्न था । अत: राजपूतों की पराजय के कारण भी असाधारण ही होने चाहिएँ । पाश्चात्य इतिहासकारों ने तो राजपूतों को पराजय के ऐसे कारण बताये हैं जो भारतीय इतिहासकारों के लिए हास्यप्रद प्रतीत होते हैँ और मुस्लिम इतिहासकारों को स्लाघनीय लगते हैँ । बिदुर भी हम सभी पक्षों की धारणाओं क्रो ध्यान में रखते हुए पराजय के कारणों का उल्लेख करते ।

पाश्चात्य धारणा की सार्थकता पाश्चात्य धारणा के प्रतिपादन मेँ दो अंग्रेज इतिहासकार उल्लेखनीय हैँ-लेनपूल तथा बीए. स्मिथ । लेनपूल का कहना है कि आक्रक्याकारियों में संगठन तथा एकता धी और हिन्दुओँ में फूट थी । आक्रमणकारी उत्तर के रहने वाले घे और हिन्दू दक्षिण के । आक्रमणकारी बहादुर जाति के और फ्लो जलवायु के निवासी ये । उनमें इस्लाम धर्म के लिए जोश था और धन की लूट का लालच था । यही हिन्दू क्या आक्रमणकारियों में भेद था ।” इसी धारणा का समर्थन करते हुये विन्सेन्ट स्मिथ ने लिखा है…'” आक्रमणकारी अच्छे योद्धा थे, क्योंकि वे उत्तर के शीत प्रदेश से आये थे । वे मांसाहारी थे और युद्धक्रला में दक्ष थे ।” इन दोनों इतिहासकारों के कथन से स्पष्ट होता है कि आक्रमणकारी मुसलमान भारत के राजपूतों से इसलिए विजयी हुए क्योकि वे उत्तरी शीत प्रदेश के निवासी थे,मांस-भक्षण करते थे तथा वे युद्ध-कौशल में भी राजपूतों से अधिक दक्ष थे । उक्त दोनों इतिहासकारों के कथनों में कितना सत्य है…इसे जाँचने के लिए हमेँ तत्कालीन ऐतिहासिक घटनाओँ का आश्रय लेना चाहिये । अरब के मुसलमान सिन्ध में 712 ईं. में आ गये- परन्तु 712 ईं. से लेकर 1000 ईं. तक भारत पर कोई भी मुसलमान आक्रमण नहीं हुआ । सिन्थ के आस-पास के प्रदेशों के हिन्दू लगभग तीन सौ वषों तक अरब के मुसलमानों से संघर्ष करते रहे और उन्हें आगे बढ़नै से रोको रहे । इतने दीर्घकाल तक किसी भी देश के निवासियों ने मुसलमानों से संघर्ष नहीं किया । अरब के मुसलमानों ने ही उत्तरी अफ्रीका, मिस्त्र, फ्रांस, स्पेन व पुर्तगाल पर अधिकार किया था । उन देशों के लोग भी शीत जलवायु के थे तथा सरेस-भक्षण करते थे । फिर भी वे मुसलमानों से शीघ्र ही परास्त हो गये तथा अपनी संस्कृति का भी मुस्लिम संस्कृति में आत्मसात् कर बैठे । भारत में तो मुसलमान विजेता एवं शासक के रूप में सदियों रहे पर तब भी वे भारत के समस्त हिन्दुओं क्रो मुसलमान बनाने में असमर्थ रहे । इसके अलावा वे हिन्दू-संस्कृति को भी पूर्णरूपेण प्रभावित नहीं कर सके । टाइटस (पांम्भड्ड) का यह कथन कि, “इस्लाम पर हिन्दू-धर्म का जितना प्रभाव पड़ा, उतना हिन्दू-घर्म पर इस्लाम का नहीं और यह आश्चर्य की बात है कि अब भी हिन्दू-धर्म निभौंक्लर क्या आत्मविश्वास के साथ अपने पथ पर उसी प्रकार अग्रसर है, जैसे इन आक्रमणों के पहले चल रहा था” सही एवं तर्कपूर्ण जान पडता है ।1 पदिचमी देशों के इतिहासकारों ने मुस्लिम बिजय का एक कारण मुसलमानों का हष्ट-हुँष्ट होना भी बताया है । उनका कहना है कि एक पठान दस भारतीय सैनिकों के समान होता पर उनके इस कथन में कितना सत्य दै-यह हम पाकिस्तान के साथ लडे गये गत दो युद्धों (1965 व 1971) की घटनाओं से आंक सकते हैं । इसराइल के यहूदी तो हमारे मारवाडिर्यों की भाँति व्यापारी हैं । परन्तु उन्होंने भी आज अरब के मुसलमानों के वंशजों के छकके छुडा रखे हैं । चारों ओर मुस्लिम देशों से धिरा होने पर भी इसराइल ने मुस्लिम देशों की नाक में नकेल डाल रखी है । सयुवत्त राष्ट्र संघ ने प्रस्ताव पारित कर मुसलमानों के देश फिलीस्तीन क्रो विभक्त कर इसराइल को मान्यता दे दी है । आज़ तक भी कईं पश्चिमी राष्ट्र इसराइल पर दवाब डाल रहे हैं कि वह इसराइल से समझौता करले परन्तु इसराइल के लोग मुसलमानों से निर्भिक हो अपना राज्य चला रहे हैँ और समझौता नहीं का रहे हैँ । आज फिलीस्तीन का नेता जहाँ से विदा ले चुका है और इसराइल अपना अस्तित्व बनाए बैठा है । इस दृष्टान्त से स्पष्ट होता है कि अच्छा योद्धा होना न तो शारीरिक गठन ओंर न शीत जलवायु पर ही निर्भर करता है । अच्छे योद्धा के गुण कुछ और ही होते हैं जो भारतीय सैनिकों मेँ सदियों से विद्यमान थे और आज भी विद्यमान है । दक्षिण भारत के मराठा गर्म जलवायु के रहने वाले नाटे कद के थे, पर उन्होंने औरंगजेब के नेतृत्व में युद्ध करने वाली मुगल सेना, जिसमेँ अफ़गान व पठान काफी संख्या में थे, क्रो लोहे के चने चबवा दिए थे । औरंगजेब ने अपने शासन के पच्चीस वर्ष दक्षिण मेँ मराठों के दमन में व्यतीत क्रर दिए लेकिन वह उनका दमन नहीं का सका । स्वयं मुस्लिम इतिहासकार गुलाम अली तथा मुर्तजा हुसेन को यह स्वीकार काना पड़ा कि दस मराठे बीस से भी अधिक हष्ट-षुष्ट पठानों के लिए पर्याप्त हैं ।

इसके अलावा पाश्चात्य इतिहासकारों ने हाथियों के प्रयोग को भी राजपूतों की पराजय का एक कारण बताया है । परन्तु यदि ऐसा था तो महमूद गजनबी और मुहम्मद गोरी दोनों ही भारत से भारी संख्या में हाथी क्यों ले गये ? मध्य एशिया में अपने साम्राज्य विस्तार तथा उसके अस्तित्व के लिए उन्होंने हाथियों को क्यों उपयोगी समझा ? यह सब लिरव्रते हुए भी हमेँ यह तो स्वीकार करना पड़ेगा ही कि भारत के हिंन्दू नरेश तुर्कों से परास्त हुए और परास्त होने के झ्व कारण तो होने ही चाहिए ।

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