राजपूतो के पराजय के सामान्य कारण

ईन कारणों के अलावा हम और भी कारण निर्धारित कर सकते हैं । उनको हम सामान्य कारणों की श्रेणी में ले सकते हैं । वे कारण निम्नलिखित हैं…

( I ) सामाजिक : भारत को बिमिन्न जातियों व धर्मों का अजायबघर माना जाता है । भारत में जातियाँ स्तनों अधिक संरक्या में हैं कि वे विश्व के किसी अन्य देश में नहीं’ हैं । इन विभिन्न ने भारतीय समाज का रूप भी बिभिन्न प्रकार का बना दिया है । सज जातियों की उस मान्थता दो गई थी कि देश की सुरक्षा केवल राजपूतों के कन्धों पर ही है । अत; युद्ध विद्या के सिवाय ओर कौई वर्ग नहीं सीखता था । यह सत्य है कि उस काल में राजपूत तलवार के धनी, चरित्रवान एवं वीर योद्धा होते थे । पर उनमे शनैः शनैः विलासिता भी अपना घर कर रही थी । इस कारण वे निर्बल होते जा रहे थे । इसके अतिरिक्त समाज में ऊँचन्तीच की भावना ने समाज में से एकता तथा मातृत्व की भावना को विनिष्ट कर फूट के बीज बो दिए थे । एक राज्य के सैनिक दूसरे राजा के नेतृत्व में युद्ध करना अपनी हीनता समझते थे । आत्म प्रतिष्ठा, स्वाभिमान की भावना होना समाज मे श्रेष्ठ माना जाता है, परन्तु कभी-कभी राजपूत अहंकार के झुठे आत्माभिमान पर झगड़ पड़ते थे । इससे उनमे वैमनस्य की भावना प्रबल हो गई थी । एक राजा अपने पडौसी राजा के राज्य को जीत कर अपना साम्राज्य बढाने में अपना गौरव समझता था । इसी कारण भारत के लोगों के दिलों से राष्ट्रीय भावना भी लुप्त होती जा रही थी । इसी तथ्य का समर्थन करते हुए प्रो. निजामी लिखता है कि भारतीयों की पराजय का मुख्य कारण उनकी सामाजिक अवस्था और अन्यायपूर्ण जाति भेद ये जिन्होंने सम्पूर्ण सैनिक-संगठन को अरक्षित और दुर्बल बना दिया था ।” इसके विपरीत मुसलमान एक जाति के होने के कारण एकता के सूत्र में गुंथे हुये थे । उनमें ऊँच नीच की भावना विद्यमान नहीं थी । इसलिए उनमें मातृत्व था और वे एक होकर राजपूतों पर आक्रमण करते थे । यही कारण था कि वे हिन्दूनरेशों पर विजय मा सके ।

(II) धार्मिक भारतवासियों की आत्मा धर्म मानी जाती है । हम धर्म के नाम पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर सकते हैं । परन्तु उस समय धर्म में मिथ्या आडम्बर के घुन लग रहे थे । इस मिथ्याडम्बर के कारण ही हिन्दू धर्म का हास हुआ और उसके पतन पर बौद्ध-धर्म तथा जैनधर्म का प्रादुर्भाव हुआ । इन दोनों धर्मों के आविर्भाव से भारत में अहिंसा की भावना प्रबल रूप धारण काने लगी थी । परिणामत: युद्ध प्रवृत्ति को आघात पहुँचा था । सामाजिक सम्प्रदायों की भाँति धर्म में भी कईं सम्प्रदाय बन गये थे । उनमें भी पारस्परिक ईर्ष्या थी और वह ईंष्यों कभी-कभी शास्वीय मतभेद की सीमा लांघकर राजनीतिक कुचक्रों के स्तर पर आ जाती थी । हिन्दू सम्प्रदाय भाग्यवाद की ओर अधिक झुक रहा था । ज्योतिषियों क्री भविष्यवाणियों पर अत्यधिक विस्वास करने के कारण कई वार मुस्लिम आक्रमणकारियों से परास्त होना पड़ा था । मुस्लिम कुशासन व उनके द्वारा कराये जा रहे धर्म-परिवर्तन को वे अपने भाग्य का फेर समझ बैठे थे । इसके अतिरिक्त तत्कालीन भारत में प्रचलित भक्तिमार्ग ने भारतवासियों के दिलों में क्रोध, अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध सहिष्णुता व घृणा के स्थान पर करुणा व क्रोमल भावों का सूत्रपात करना आरम्भ कर दिया था । क्षत्रिय धर्म का अर्थ भी इस समय गलत लगाया जाने लग गया था । परिणामत: हिन्दुओं में प्रतिकार की भावना दिनों-दिन क्षीण होती जा रही थी । हर मुसीबत को दैविक प्रकोप समझकर उनकी क्रियाशीलता नष्ट हो रही थी । इसके विपरीत मुसलमान धार्मिक उन्माद में आकर जिहाद का नारा बुलन्द करते युद्ध करते थे । इस्लाम के प्रचार व प्रसारके लिए मर जाना वे एक पवित्र धार्मिक कार्य समझते थे । दूसरा प्रलोभन उनको देवालयों में बिरसिंचित धन राशि लूटने का रहता था । अत: वे उत्साहपूर्वक देव मूर्तियों को खंडित कर अपना उन्माद बढाते थे और दूसरी तरफ हिन्दुओँ में धार्मिक आस्था घटाते थे । युद्ध करना व धर्म और देश की रक्षा का उत्तरदायित्व राजपूतों को सौंपकर शेष हिन्दूवर्ग अपने कार्यों में व्यस्त रहते थे । इस प्रकार धर्म की कुंठित धारणाओं ने भारत की सैन्य शक्ति को नष्ट एवं निर्बल बना दिया था ।

(III) सैनिक राजपूतों की पराजय का प्रमुख कारण सैनिक था । राजपूत लडना जानते थे, पर उनकी युद्ध-विधि मुसलमानों की युद्ध-बिधि की तुलना में त्रुटिपूर्ण एवं निर्बल थी । राजपूतों ने मुसलमानों का सामना अपने पुरातन ढंग से ही किया । डॉ. स्मिथ का कहना है, “यद्यपि स्वदेश की रक्षा के भावों से परिपूर्ण हिन्दू राजा साहस और तीस्ता में किसी प्रकार भी मुसलमानों से कम नहीं थे, तथापि युद्ध-कला पें वे निश्चित रूम में उनसे हीन थे । इसलिये वे अपनी रक्षा नहीं कर सके ।” केवल राजपूत ही उस समय भारत के सैनिक होते थे । अत: देश की तीन चौथाई से भी अधिक जनता देश की सुरक्षा व सैनिक कार्यों में रुचि नहीं रखती थी । राजपूत भी केवल अपने राजा के लिये युद्ध करते थे न कि भारत माता के लिए । अत: ज्योंही राजा युद्ध में धराशायी हो जाता था किसी कारणवश युद्ध-भूमि से भाग जाता, तो समस्त राजपूत सेना समर-भूमि मेँ पीठ दिखा दिया करती थी,चाहे वह जीत ही क्यों न रही हो । इसके अलावा हिन्दू-राजा उस समय स्थायी सेना नहीं रखते थे । वे केवल अपने अधीन जागीरदार व सहयोगी नरेशों की सेना पर ही अवलम्बित रहते थे । इस कारण उन्हें अपनी शक्ति का वास्तविक ज्ञान नहीं हो पाता था और वह सेना भी पैदल सैनिकों की होती थी जो तीव्रगामी मुस्लिम अरवारोहियों का मुकाबला नहीं कर सकती थी । स्टेप्स के इन खानाबदोशों क्रो युद्ध में ‘घोडों का युग’ के प्रारम्भ करने का श्रेय दिया जाता है । इसके अलावा भी राजपूत नरेश कई बार युद्ध में भारी गलती कर बैठते थे । उदाहरण के लिए हम राजा दाहिर को ही लें । जब अरब के मुसलमानों ने देवल (कराची) पर आक्रमण किया तो राजा ने देवल की सुरक्षा के लिए सेना नहीं भेजी । जब मुहम्मद बिन कासिम ने घोडों की बीमारी के कारण सिन्थ पर दो मास तक आक्रमण नहीं किया, तो राजा दाहिर भी उसकी प्रतीक्षा करता रहा । उसने मुसलमानों की दयनीय अवस्था का लाभ उठाकर आकस्मिक आक्रमण नहीं किया । स्वाभिमानी होने के कारण राजपूतों क्रो एक नेता चुनने में बडी कठिनाई होती थी । सामन्ती सैनिक युद्ध-विद्या में अधिक पारंगत न होने के कारण वे केवल आत्मरक्षीय युद्ध ही करते थे । शत्रु के विनाश का वे कोई प्रयास नहीं करते थे और जब वे युद्धभूमि क्रो कूच करते तो अपनी समग्र शक्ति समर भूमि में ही लगा दिया करते थे और वे युद्ध भी परम्परागत विधि से ही करते थे जबकि मुसलमान नवीन विधियों से युद्ध करते थे । राजपूत सुरक्षा के लिए कुछ सैनिक (सुरक्षा-पंक्ति) पीछे नहीं छोडते थे । इसके विपरीत मुसलमानों का सैन्य-संगठन अच्छा था । वे घोडों की पीठ पर युद्ध करते थे, जो हाथी और रथों से अधिक द्रुतगामी होते थे । तुर्की घुडसवार उस समय समस्त एशिया में सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे । अरब के व्यापारी अच्छे अश्व प्रथम अपने मुस्लिम मालिकों क्रो देते थे और निम्न श्रेणी के घोड़े वे भारत में लाकर बेचते थे । इसीलिए प्रो. निजामी ने लिखा है कि उस युग में गतिशीलता तथा शस्त्र सुसज्जित घुडसवार सेना उस समय की आवश्यकता थी ।” इसी प्रकार के विचार रखने वाले यदुनाथ सरकार ने भी लिखा है, “सीमा पार के इन आक्रमणकारियों के शाओ और अश्यों ने उनको भारतीयों पर विवाद-रहित सैनिक श्रेष्ठता प्रदान की थी ।” आरसी. स्पेल इस सन्दर्भ में लिखता है, “गतिशीलता के बाद तुर्कों की सामरिक चालों की दूसरी विशेषता उनकी धनुर्विद्या थी । तुर्क सैनिक घुनर्विद्या में इतने दक्ष होते थे कि वे दौडते हुए अश्यों की काठी पर बैठकर धनुष का प्रयोग करते थे । इससे उन्हें भारतीयों की भारी भरकम और मन्दगति से चलने वाली सेनाओं की तुलना में अधिक लाभ रहता था । इसके अलावा तुर्क सैनिक दूर से भारतीय सैनिकों पर अचानक हमला बोलते थे । वे तुमुल युद्ध से बचते थे । तीर चलाने में भी मुस्लिम सैनिक अधिक फुर्तीले तथा दक्ष होते थे । उन्होने अपनी सुरक्षा के लिए रकाब का प्रयोग आरम्भ कर दिया था तो घोडों को फुर्तीला बनाने हेतु उनके पाँवों में नाल लगाना शुरू कर दिया था । मुहम्मद गोरी की सेना में युद्ध प्रवृत्ति के कबीलों से सैनिक भर्ती किए जाते थे । वे सेल्युक तुकों व अन्य खानाबदोश खूँखार जातियों से निरन्तर युद्ध करने के अधिक कारण युद्ध-कुशल होते थे ।

( IIII ) राजनीतिक मुसलमानों से राजपूतों के हारने के राजनीतिक कारण भी थे । मारत उस समय कई छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था । उनके राजा अपने को पूर्ण सम्प्रत्रु समझते थे । अतएव वे एक-दूसरे से द्वेष रखते थे । इस विषय में हाँ. एएल. श्रीवास्तव लिखते हैं, “प्रत्येक राजा को अकेले हीं करना पडता था मानो वह केवल अपने और अपने राज्य के लिए लहु रहा दो, सम्पूर्ण देश लिए नहीं । इसीलिए घोर संकट के समय भी हमारे शासक मिलकर अपनी सुरक्षा के लिये अष्कमगत्कारी के लिए युद्ध न कर सकै ।” एक इतिहासकार ने कहा है, “इसीलिए इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि राजपूत-राज्य शाहबुद्दीन (गोरी) के आगे उसी प्रकार परास्त हो गये, जिस प्रकार नेपोलियन के आगे जर्मन-राज्य परास्त हो गये थे ।” हाँ ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है, “एक राज्य दूसरे राज्य से नेतृत्व के लिए लड रहा था ओर ऐसी सार्वभौम ज्ञक्ति न यी जो किसी एकता के सिद्धान्त द्वारा उन्हें संगठित रख सकती ।

इसके साथ ही राजपूतों में योग्य नेतृत्व का भी अभाव था । डॉ. पीसी. चक्रवर्ती ने लिखा है कि, ‘भेतृत्व के क्षेत्र में प्रतिद्वस्लिं में जितना विरोध राजपूतों में था उतना विरोध और कहीं नहीं दीखता ।” डॉ. यूएन. घोषाल ने मी राजपूतों की असफ़लता का कारण उनमें पर्याप्त प्रतिभासम्पन्न नेताओं की कमी हो बताया है । आक्रमणकारियों में नेतृत्व व प्रभुता उसी को प्राप्त होती थी जो तलवार का धनी तथा मुसलमानों मेँ धार्मिक उन्मादृ भरने की क्षमता रखता था । उनमें बिना जातीय रंगभेद के सभी राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते थे । उच्चाधिकारियों की नियुक्तियाँ वंशानुगत न होकर योग्यता के आधारपर होती थी । भारत में इसके विपरीत होता था । निम्न वर्ग के लोगों क्रो राजनीतिक अधिकार तथा राजकीय सेवाएँ उपलब्ध नहीं होती थी । इस कारण वह असन्तुष्ट रहता था और राजनीतिक परिवर्तनों के प्रति उदासीन बना रहता था ।

(IV) व्यक्तिगत कारण मुस्लिम आक्रमणकारियों को विजेता बनाने मेँ उनके व्यक्तित्व ने भी महान् सहयोग दिया । नित्सन्देह, जयपाल, अनंगपाल, भोज, परमार, पृथ्वीराज चौहान, जयचन्द राठौर आदि अच्छे योद्धा, तलवार के धनी व सफ़ल नेतृत्व करने वाले थे । परन्तु यदि तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाय तो भारतीय नरेश महमूद गजनवी व मुहम्मद गोरी के समान दूरदर्शी, सफल सेनानायक व विचक्षण बुद्धि के नहीं थे । दोनों आक्रमणकारियों ने तो अपना समस्त जीवन इस्लाम के प्रचार व प्रसार मेँ ही लगा दिया था ओर उन्होंने अपने सम्पूर्ण युद्धों क्रो जिहाद में बदलने का प्रयास किया । जब कभी भी उनकी सेना में भगदड मचती या सैनिक निराश दृष्टिगत होते तो ये दोनों नेता सैनिकों में धार्मिक उन्माद उत्पन्न कर उनक्रो मन्दिरों क्रो लूटने व देवडमूर्तियों को तोड़ने में व्यस्त कर दिया करते थे । उनके अधिकांश सैनिक अवैतनिक ढोते थे । वे लूट के प्रलोभन से ही इतनी कठिनाइयाँ सहते हुए भारत आते थे । बचने का कोई सुरक्षित स्यान न पाकर वे अपने स्वामी के आदेश पर धर्म के लिए मर जाना ही श्रेयस्कर समझते थे । इसके विपरीत राजपूत नरेशों का जीवन पूर्णत: युद्ध के लिए अर्पित नहीं रोता था । वे शासन मी जलाते थे तो साथ में ऐश भी फरमाते थे । इसके अलावा इनके पास जेहाद जेसे भडकाऊ नारे नहीं होते थे और लूट के लिए धन मी नहीं होता था । जो राजपूत सैनिक होते थे वे वेतन के लिए लड़ते थे । इसके अलावा उन्हें सेनानायक भी उनकी पसन्द का उपलब्ध नहीं ढोता था ।

( IIV) आकस्मिक कारण युद्धों में पराजय व सफ़लता के कारण केवल सैनिक व शस्त्र शक्तियाँ नहीं होती वरम् कभी-कभी प्रकृति के आकस्मिक प्रकोप भी बिजय को पराजय में और पराजय को बिजय में बदल देते हैं । वर्तमान में तो आप देख रहे हैं कि अचानक वर्षा के हो जाने से क्रिकेट मैचों के परिणाम घुल जाते हैं । उसी प्रकार ऐतिहासिक व निर्णायक युद्धों के परिणाम भी आकस्मिक घटनाओँ से बदल जाते हैं । यह तथ्य भारत के साथ भी तुकों आक्रमणों के दौरान स्पष्ट दृष्टिगत होता है । जयपाल उत्तर-पश्चिमी भारत की सीमा पर एक शक्तिशाली शाही राजा माना जाता था । 986 ईं. में उसने अपनी सेना के साथ सुबुवत्तगीन पर आक्रमण किया । यूद्ध कई दिन चला । जब जयपाल को विजयश्री वरण करने जा रही थी कि अचानक बफोंले तूफान व ओलों की वर्षा ने युद्ध का पासा पलट दिया । जिस प्रकार रूस के हिमपात ने नेपोलियन व हिटलर की विजर्यो को विनाशकारी पराजयों मेँ परिणित कर दिया, उसी प्रकार इस बर्फत्नि तूफान ने जयपाल के सैनिकों क्रो स्वर्ग पहुँचाकर जयपाल क्रो अपमानजनक सन्धि स्वीकार करने बाध्य कर दिया । आनन्दपाल को पराजय उसके हाथो ने दिलवाई जो अचानक बिगड कर युद्धभूमि से भाग गया था । इन दोनों आकस्मिक घटनाओँ ने शाही राजाओं की सैनिक शक्ति क्रो नष्ट कर दिया । भारत में आक्रमणकारियों के रूप में आने वाले तुर्कों को रोकने वाली उत्तर में कोई शक्ति नहीं रही और वे भारत में आगे बढते ही चले गये । पृथ्वीराज चौहान के परास्त हो जाने पर लोगों की निगाह कन्यौज के राजा जयचन्द पर आ टिकी । परन्तु चन्दवार के युद्ध में बिजय की ओर बढते जयचन्द की आँख में अचानक तीर आ लगा । उस तीर ने विजय क्रो पराजय में बदल दिया ।’ अत: तुर्कों क्रो सफ़लता उपर्युक्त सभी कारणों के सामूहिक रूप में एकत्रित हो जाने के परिणामस्वरूप मिली ।

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