राजपूत राज्यो की हार के कारण

आधुनिक युग के विख्यात इतिहासकार सर जदूनाथ सरकारने भी अपने महान् शोधकार्य के उपरान्त राजपूत नरेशों की पराजय के निम्नलिखित कारण बताये हैँ…

(1) आपस की फूट जदुमाथ सरकार क्री मान्यता है कि देश का सबसे महान् शत्रु घर का भेदी तथा देशवासियों की आपसी फूट होती है । सातवीं शती से पूर्व अफ़गानिस्तान तथा सिंन्ध के हिन्दू शेष भारत से विलग समझें जाते थे । युवांच्यांग द्वारा प्रस्तुत भारत वर्णन से विदित होता है कि उस काल में उत्तर-पदिचमी सीमावर्ती हिन्दुओँ को असभ्य समझा जाता था । सच बात तो यह है कि वहॉ के हिन्दुओँ में ग्रीक, पार्थियन, हूण तथा कुषाण आदि लोग सम्मिलित थे । अत: यह स्वाभाविक ही था कि उनके रिवाज़, रहन-सहन पंजाब, दोआब व राजस्थान के लोगों से भिन्न हो । इस कारण जब सिन्थ पर अरब के मुसलमानों ने तथा अफगानिस्तान ब पंजाब की सीमा पर महमूद गजनवी व मुहम्मद गोरी ने आक्रमण किये तो शेष भारत के लोगों ने उनमें विशेष रुचि नहीं ली और जब वे आक्रमणकारी आगे बढे तो यहाँ राजाओं के आपसी झगडे उन्हें ले बैठे । जयचन्द और पृथ्वीराज की फूट तथा उसके परिणाम तो सर्वविदित हैं ही । परन्तु इस प्रकार की फूट तो मध्य एशिया के मुस्लिम सुल्तानों में भी थी जो एक-दूसरे के विनाश के लिए सतत् प्रयत्नशील रहते थे और संघर्ष करते रहते थे । अत: यह भी राजपूतों की पराजय का प्रमुख कारण नहीं माना जा सकता । हा, तुर्की अश्वारोही विजय दिलाने में अवश्य सहायक सिद्ध हुए ।

(2) मौर्य-साम्राज्य के पतन कै उपरान्त उत्तरी भारत में शक्तिशाली केंद्रीय शक्ति का अभाव चन्द्रगुप्त मौर्य ने सैल्यूकस को परास्त कर पंजाब व भारत की उत्तरी-पश्चिमी सीमा को यूनानियों से मुक्त करा लिया था । सम्राट अशोक ने मी अफगानिस्तान तक अपना पूर्ण प्रभाव रखा था । परन्तु मौर्य साम्राज्य के पतन के उपरान्त उत्तरी भारत मेँ ऐसी केन्दीय शक्ति का अभाव हो गया । गुप्तवंश के नरेशों ने उत्तरी भारत में शक्तिशाली सरकार की स्थापना अवश्य की थी; परन्तु वे भारत कौ उत्तर-पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा का पर्याप्त प्रबंध नहीं कर सके थे । यही बात हर्ष के शासन के साथ लागूंहोती है । इसका परिणाम यह हुआ कि भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर कईं गणराज्य व स्वतन्त्र राज्य स्थापित होते चले गये और उन्होंने आपस में सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था की ओर ध्यान नहीं दिया । इस कारण वे परास्त हुए ।

(3) ब्राह्मणवाद : हिन्दुओँ की पराजय का तीसरा कारण डॉ. यदुनाथ सरकार ने ब्राह्मणवाद बताया है । ब्राह्मणवाद के प्रभाव से प्रथम परिणाम तो यह निकला कि प्रशासन में ब्राह्मणों ने उच्च पद प्राप्त कर लिए । मची-पद पर पहुँचकर उन्होंने अपने स्वामी राजपूत नरेशों को मौत के घाट उतार दिया । इससे प्रशासन में अस्थिरता आ गई । काबुल राजा के मंत्री ब्राह्मण लल्ल ने अपने स्वामी लगतोरमन क्षत्रिय राजा को कारावास में डालकर सत्ता हथिया ली । परन्तु उसे सत्ता हथियाये एक वर्ष भी नहीं हुआ था कि वह सफरीद याकूब से परास्त हो गया । इसका फल यह हुआ कि अफगानिस्तान जो सदियों से भारत का अंग रहता आया था, अब सदैव के लिए मुस्लिम आक्रमणकारियों के प्रभाव में चला गया । सिन्ध का राजा दाहिर भी ब्राह्मण ही था । वह चच का पुत्र था और चच सिन्थ के राजा सहसिराय द्वितीय का मची था, जो अपने स्वामी का वध कर सिन्थ का स्वामी बन बैठा था । इसके अलावा ब्राह्मणवाद के बढते प्रभाव से बौद्ध-धर्म वाले भी हिन्दू विरोधी व मुस्लिम समर्थक हो गये थे । ब्राह्मणों ने उच्च स्थान पाकर राजपूतों को भी अपने से हीन समझना आरम्भ कर दिया । परिणाम यह निकला कि ब्राह्मण व क्षत्रिय एक-दूसरे के पूरक न रहकर एक-दूसरे के प्रतिद्वन्हीं बन गये ।

(4) सर्वसाधारण का नैतिक पतन राष्ट्र-निर्माण मेँ जनता का नैतिक जीवन व उच्च चरित्र महान् सहायक सिद्ध होते हैँ । परन्तु मध्य-युग के प्रारम्भ से उत्तरी भारत के लोगों का नैतिक पतन आरम्भ हो गया था । लोगों में विलासिता की भावना घर करती जा रही थी । उनकी इस भावना का प्रतिबिम्ब हम कोणार्क, खुजराहो के मन्दिरों में देख सकते हैं । पृथ्वीराज चौहान की पराजय का एक यह भी कारण बताया जाता है कि वह संयोगिता को प्राप्त कर विलासी अधिक हो गया था । ऐसी परिस्थितियों मेँ हिन्दू नरेशों का परास्त होना स्वाभाविक ही था ।

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