शहाबुद्दीन गोरी के आक्रमण

अजमेर में दूसरा विद्रोह राजपूत नरेशों को गोरी की अजमेर व्यवस्था असह्य थी । इसमें उनका घोर अपमान था । अत: पृथ्वीराज के भ्राता हरिराज ने मुहम्मद गोरी के गजनी लौटते ही रणथम्भोर का दुर्ग घेर लिया । यहाँ गोरी अपने अधिकारी किबाम उल मुल्क के नेतृत्व में मुस्लिम सेना छोड़ गया था । इसके अलावा कुछ चौहानों ने पृथ्वीराज के पुत्र को भी अजमेर से मार भगाया, क्योंकि उसने गोरी की दासता स्वीकार कर ली थी । इस पर ऐबक स्वयं सेना लेकर अजमेर आया और उसने अजमेर तथा रणथम्भीर दोनों स्थान को पुन: विजित कर लिया और अपने स्वामी गोरी के सामन्त को पुन: अजमेर को गद्दी पर बिठा दिया । परन्तु पृथ्वीराज का भाई हरिराज उससे परास्त नहीं हुआ । इसी अन्तराल में डोर राजपूतों ने विद्रोह कर दिया और उसे दबाने हेतु कुतुबुद्दीन को अजमेर छोडकर यमुना के पार जाना पड़ा । इस अभियान में ऐबक ने 1194 ईं. में अलीगढ पर अधिकार कर लिया ।

जयचन्द पर गोरी का आक्रमण तराइन के दूसरे युद्ध मेँ जयचन्द ने पृथ्वीराज चौहान का साथ नहीं दिया था । उसने मुहम्मद गोरी को सेनिक सहायता देने का वायदा कर गोरी को भारत अग्रमन्वित अवश्य कर लिया था परन्तु जयचन्द ने युद्ध के समय तुर्क आक्रमणकारी की मी सैनिक सहायता नहीं की थी । उसकी सेना युद्ध भूमि से दूर रहकर तमाशबीन ही बनी रही थी । इसका बदला लेने तथा अन्तबेंद पर अधिकार करने की नीयत से 1194 ई. में गोरी ने जयचन्द पर धावा बोल दिया । कन्यौज के समीप चन्दवार नामक स्थान पर दोनों ओर को सेनाएँ आ डटीं । प्रथम तो ऐसा लगा कि विजयश्री जयचन्द का वरण करने जा रही है, परन्तु ज़यचन्द को आँख मेँ तीर लग जाने से युद्ध का पासा पलट गया । कनौज़ में मुसलमानों ने छलकपट , बलात्कार व हिन्दू औरतों के साथ अन्य अत्याचार किए । इब-अल अथिर लिखता कि इस युद्ध में हिन्दुओँ का भयंकर संहार हुआ । हिन्दू पुरुषों का तब तक कल्लेआम चलता रहा जब तक मुस्लिम सैनिक थक नहीं गये । देवालय धराशायी कर उनको लूटा गया । चन्दवार में विजय प्राप्त कर गोरी बनारस गया और बनारस के मन्दिरों को लूटा । लूट का सामान 1400 ऊँटों की पीठ पर लाद का गजनी ले जाया गया । क्लोज और बनारस पर मुसलमानों का अधिकार हो गया । इस बिजय के उपरान्त गोरी गजनी लौट गया । इस आक्रमण में बनारस के ही एक हजार देवालय ध्वस्त कर दिए गए थे ।

चन्दवार युद्ध के परिणाम चन्दवार के युद्ध में विजयी बन जाने के कारण गोरी को तराइन के युद्ध की भाँति बड़ा साम्राज्य और मिल गया । जयचन्द के राज्य के कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण नगरों पर जहाँ गहड़वालों के खजाने थे, मुसलमानों ने उन पर भी अधिकार का लिया, परन्तु क्रमौज पर वे 1198 ईं. से पूर्व अधिकार नहीं कर सके और जयचन्द के वंशज उसके छोटे से भाग पर शासन करते रहे । कुछ इतिहासकारों का कहना है कि उनको जीतने क्री क्षमता अब मुसलमान सैनिक में नहीँ रही थी । अवध बिहारी पाण्डेय का कहना है कि -चन्दवार के युद्ध में परास्त हो जाने पर राहड़वग्लो की शक्ति घट अवश्य गईं धी परन्तु समाप्त नहीं हुईं धो । इसीलिए 1199 ईं. तक मुसलमान कनौज पर अधिकार नहीं कर पाये थे । 1199 ईं. में मछलीशहर मेँ प्राप्त जयचन्द के पुत्र हरिश्वन्द्र के दानं-पत्र से ज्ञात होता है कि वह एक स्वतन्त्र राजा बना रहा ।

अजमेर में तीसरा विद्रोह कुतुबुद्दीन अपने स्वामी के गजनी लौट जाने के बाद भी गहड़वालों से उलझा रहा । इस अन्तराल में पृथ्वीराज के आता हरिराज ने पुन: अजमेर को मुस्लिम दासता से स्वतन्त्र कराने ‘का प्रयास किया । उसने अपने भतीजे को अजमेर दुर्ग से निकाल कर अजमेर पर अधिकार कर लिया और एक सेना दिल्ली पर विजय पाने के लिए भेज दी, क्योंकि कुतुबुद्दीन क्रो इस समय कौल (अलीगढ) के रक्षक की सहायतार्थ अलीगढ जाना पडा था । राजपूतों में अब भी स्वातंत्र्य उत्ताल तरंगें हिलोरें मार रही थीं । अवसर मिलते ही राजपूत यवनों को भारत से खदेड़ने का प्रयास करते थे । हरिराज का अजमेर पर अधिकार करने का यह तीसरा प्रयास था । खबर मिलते ही ऐबक सेना लेकर दिल्ली और अजमेर की रक्षा के लिए लौट आया । राजपूत सेनानायक झटराय ने दौड़क्रर अजमेर के एक दुर्ग में शरण ले ली । हरिराज भी शीघ्रता से अजमेर आ पहुँचा । ऐबक्र ने दुर्ग घेर लिया और रसद बन्द कर दी । भावी समस्या का आभास कर हरिराज ने अपने को अग्नि के भेंट चढा दिया और अजमेर पर पुन: मुसलमानों का अधिकार दो गया । इस बार ऐबक ने पृथ्वीराज के पुत्र को अजमेर से हटा दिया और एक मुस्लिम को वहॉ का हाकिम नियुक्त कर दिया और गोविन्दराज को रणथम्मीर मेज दिया ।

निद्रसन्दे हरिराज अपने उद्देश्य प्राप्ति में असफल रहा, परन्तु उसका त्याग व्यर्थ नही’ गया । अपने को वेदी पर चढा कर वह भावी पीडी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन गया । राजपूतों में उसका महत्व वना रहा और चौहान प अन्य राजपूत अपनी स्यतन्त्रता के लिएनिरन्तर संघर्ष करते रहे । उसके अनुयायियों ने आक्रमणकारियों को वैन की नींद नहीं’ सोनेदिया । बयाना और ‘ग्वालियर पर आक्रमण शहाबुद्दीन गोरी का प्रतिनिधि कुतुबुद्दीन भी साम्राज्यवादी भावना से प्रेरित हो गया था । अपने स्वामी के गजनी लोट जाने पर मी उसका विजय-अभियान चलता रहा और 1195 ईं.र्में स्वयं गोरी भी भारत लौट आया ।

कुतुबुद्दीन ने अपने स्वामी के साथ बयाना य ग्वालियर के लिए प्रस्थान किया । दोनों स्थानों पर उन्हें उप प्रतिरोध का सामना काना पडा । बयाना मेँ उस समय जादोंपट्टी राजपूतों का राज्य था । राजा कुमारपाल ने थंगीर के दुर्ग से शत्रु का सामना किया, परन्तु वह परास्त हुआ । परिणामत: मुसलमानों का थंगीर और विजयट्वेमन्दिरगढ़ के दुर्गों पर अधिकार हो गया और उनकी रक्षार्थ गोरी ने बहाउद्दीन तुगरिल को छोड़ दिया । तुगरिल ने अपनी स्थिति सुदृढ बनाने हेतु कोट में एक सैनिक चौकी कायम की । यहॉ से वह बयाना के समीप के प्रदेशों की क्या कर सकता था ।

बयाना को विजित का गोरी ग्वालियर की तरफ़ बढा और दुर्ग के घेरा डाल दिया । परन्तु दुर्ग इतना सुदृढ था कि लम्बे समय तक घेरा डालने के उपरान्त भी दुर्ग जीतना एक दुष्का कार्य प्रतीत हो रहा या । परन्तु ग्वालियर के राजा ने गोरी को अपना स्वामी भी मान लिया और का देना भी स्वीकार कर लिया । गोरी लौट आया । उसकी अनुपस्थिति में ग्वालियर नरेश ने तुगरिल क्रो इतना परेशान करना आरम्भ किया कि उसने ग्वालियर का दुर्ग लौटा दिया, लेकिन तुगरिल ने पुन: घेरा डाला । यह डेढ़ बर्ष तक चलता रहा । दुर्ग मेँ रसद पहुँचना बन्द हो गया । अन्त में हताश होकर राजपूतों ने दुर्ग तुगरिल के हवाले कर दिया ।

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