शाहबुद्दीन ने किए हुए आक्रमण

राजस्थान में चौथा विद्रोह राजपूतों को मुस्लिम दासता बुरी तरह से अखर रही थी । उनकी दासता एक क्रंड़वे लूँट निगलने के समान लग रही थी । वे दासता के जूड़े को उतार फेंकना चाहते थे । इस बार मेद और चौहानों ने विद्रोह का श्री गणेश किया । उन्होंने अन्हिलवाड़ा के चालुक्य नरेश को भी आमन्वित कियाक्योंकि अन्हिलवाड़ा में गोरी बुरी तरह परास्त हो चुका था । उन्होंने अजमेर स्थित तुर्क सेना को घेर लिया । अजमेर के हाकिम ने अपने स्वामी गोरी से कुमुक भेजने की जोरदार अपील की । ऐबक्र स्वयं अजमेर आया । परन्तु इस वार ऐबक क्रो हार का मुँह देरव्रना पड़ा और उसने दौड़कर अजमेर के दुर्ग मेँ शरण ली । राजपूतों ने दुर्ग घेर लिया । परन्तु इसी समय गोरी ने गजनी से कुमुक भेज दी । परिणामत: राजपूतों क्रो घेरा उठाना पड़ा । ऐबक इस बिजय पर इतना प्रसन्न हुआ कि उसकी गिद्द-दृष्टि गुजरात पर पड़ गई, क्योंकि इस अभियान में अन्डिलवाड़ा का राजा राजपूतों की सहायता कर रहा था ।

गुजरात पर आक्रमण ॰ ( 1197 ईं) गुजरात पर यह हमला प्रतिशोधात्मक्र या । हालांकि 20 चाई पूर्व स्वयं गोरी वहाँ बुरी तरह परास्त होकर लोटा था । परन्तु इस बार ऐबक ने हिम्मत कर 1197 ईं. में गुजरात पर धावा बोल ही दिया । राजपूतों ने बडी चीरता से शत्रु का मुकाबला किया, परन्तु इस बार पराजय उनके नसीब मेँ थी । युद्ध में 15 हजार राजपूत सैनिक शहीद दो गये और 20 हजार बन्दी बना लिए गये । ऐबक्र लूट मचाने में भी पीछे नहीं रहा । परन्तु वह गुजरात पर अधिकार नहीं कर सका । फरिश्ता कहता है कि गुजरात में एक मुस्लिम अधिकारी नियुक्त कर दिया गया था, किन्तु राजपूतों ने उसे शीघ्र ही खदेड दिया । राजूपतों की चीरता देख ऐबक्र फिर गुजरात पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं कर सका ।

बुन्देलखण्ड की विजय ऐबक ने अपनी बिजय यात्रा बन्द नहीं क्री । गुजरात के उपरान्त भी -मोटे सैनिवंट अभियान चलते रहे । 1197-98 ई. में उसने राष्ट्रकूट नरेशों से बदायूँ छोन लिया । विजित वनारस मुसलमानों के हाथ से निकल गया था । ऐबक ने उस पर पुन: अधिकार किया । इसके उपरान्त उसने मालवा में पैर पसारे । परन्तु यहॉ उसकी सफ़लता अस्थायी सिद्ध हुईं । 1202-03 ई. मेँ ऐबक की सेना चन्देल राजा की सीमा पर जा पहुँची । कुतुबुद्दीन ने कालिंजर पर धावा बोल दिया । चन्देल राजाओं ने वीरता से मुकाबला किया । परन्तु मुस्लिम सैनिक अधिक थे । इस कारण चन्देलों की पराजय हुईं । हालांकि उन्होंने दुर्ग में शरण ले ली थी पर घेरा दीर्घकाल तक चलने के कारण राजा परमर्दी ने ऐबक के साथ सन्धि कर ली । परन्तु सन्धि पर हस्ताक्षर करने से पूर्व ही परमदों की मृत्यु हो गई । उसकी मृत्यु पर सेना का नेतृत्व मुख्यमंत्री आयदेव ने सम्भाला । युद्ध चलता रहा । दुर्ग में खाद्य साममी पर्याप्त थी, परन्तु पानी की पूर्ति एक झरने से होती थी । शत्रु को इसका पता चल गया । उसने झरने का बहाव मोड दिया । पानी की कमी आ जाने पर अजयदेव ने सन्धि का प्रस्ताव भेज दिया । कालिजर का दुर्ग खाली कर दिया गया । इस प्रकार ऐबक का कालिंजर, महोबा और खुजराहो पर अधिकार हो गया । ऐबक ने वहॉ हसन अर्नाल को हाकिम नियुक्त कर दिया ।

बिहार की विजय जिस समय ऐबक मध्य भारत के स्थानों को विजित काने में व्यस्त था उसी अन्तराल में हस्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बस्तियार खलजी ने भारत के पूर्वी भाग बिहारमेँ मुस्लिम सत्ता स्थापित करने की सोची । बदसूरत होने के कारण वह कोई उच्च सरकारी पद तो या नहीं सका या । आकृति भयानक होने का कारण उसे गजनी और दिल्ली मेँ भी नौकरी नहीं मिल सको थी । भाग्यवश अवध के हाकिम हिसामुद्दीन अबुल-बक ने उसे अपनी सेना में भर्ती कर लिया । यहाँ उसे अपनी वीरता व साहस का प्रदर्शन करने का अवसर मिला । परिणामत: उसे भगवत और म्यूली ग्रामों को जागीर मिल गई । धीरे-धीरे उसके साधन बढते गये और उसने अफगानों को छोटी-सी सेना तैयार कर ली और उसने बिहार में कर्पनासा नदी के किनरि पर स्थित प्रदेशों पर धावा बोलना आरम्भ कर दिया । कनौज के गहड़वालों की पराजय के उपरान्त यह प्रदेश सैनिक दृष्टि से निर्बल हो गया या । वहॉ वह लूट मार करता रहा और धन संचित करता गया । इस प्रकार वह बिहार के उदन्दपुर तक जा पहुँचा । वहाँ स्थित विश्वविद्यालय को भी नष्ट कर दिया । जो भी उसकी सुरक्षा के लिए आया उसे मार भगाया । बौद्ध-भिक्षुओं को तलवार का कलेवा बना दिया । नगर व पुस्तकालय पर अधिकार कर लिया । कुछ इतिहासकारों का कहना है कि पुस्तकों को अग्नि के भेंट चढा दिया । 1202-03 ईं. में उसने उदन्दपुर में एक दुर्ग बना लिया और विक्रमशिला व मालन्दा विश्वविद्यालयों पर अधिकार कर लिया । इस प्रकार बिहार में मुस्लिम प्रभुत्व स्थापित हो गया ।

बंगाल में मुस्लिम प्रभुत्व बिहार में जब इरिब्तयारूद्दीन को निर्विघ्न सफलताएँ मिलती चली गई तो उसकी निगाह बंगाल पर पडी । इस समय वहॉ सेन वंशीय राजा लक्ष्मण राज्य कर रहा था । राजा वृद्ध हो गया था; वह शराब का और विलासिता का पवका दास भी बन चुका था । इस कारण प्रशासन शिथिल हो गया या और राज्य में अराजकता व्याप्त हो गई थी । बंगाल की शोचनीय अवस्था देखकर इखितयारुद्दीन की बंगाल मेँ प्रवेश की हिम्मत बढ गई । झारखण्ड के वनों क्रो पार करता हुआ वह नदिया जा पहुँचा । इस समय बंगाल की दो राजधानियों थीं-ठनर्में एक नदियों थी । राजा का निवास-स्यान नदिया में ही या । मध्यान्ह काल था । राजा साहब खाना खाने बैठ रहे थे कि इरिब्तयारुद्दीन ने महल पर ही धावा बोल दिया । मुस्लिम सैनिकों ने द्वार-रक्षर्कों को मौत के घाट उतार दिया । राजा के सैनिक एकत्र भी नहीं हो पाये कि मुस्लिम सैनिर्कों ने नदिया पर अधिकार कर लिया । नगर को खूब लूटा । हिन्दुओं का कल्ल किया गया । इसके उपरान्त वह उत्तर की और बढा और गौड के समीप लख़नौती में जम गया । कुछ समय वहॉ शासन भी किया, परन्तु 1206 ईं. मे अपनी गलती से उसकी प्रभुता नष्ट हो गई और वह अलीमर्दान खाँ खलती द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया ।

गोरी की मृत्यु भारत के विजित प्रदेशों का शासनभार कुतुबुद्दीन को सौंपकर मुहम्मद गोरी गजनी लौट गया, क्योंकि मध्य एशिया में उसके सम्बन्थ ख्वारिज्म के शाह से वहुत खराब हो रहे ये । उसके विरुद्ध वह स्थायी सफ़लता नहीं पा सका था । क्ररांखिताइस इस समय ख्वारिज्म के शाह का सहयोगी वन गया था । दोनों की सयुक्त सेना ने गोरी को अन्थखुद के युद्ध में बुरी तरह से परास्त किया । अन्त मेँ गोरी ने ख्वारिज्म के सुल्तान अलाउद्दीन के साथ एक रक्षा सन्धि की । इस सन्धि के अन्तर्गत वह हिरात व बलख क्रो अपने पास रख सका । जाकी मध्य एशिया के विजित प्रदेश उसने अलाउद्दीन को दे दिए । गोरी की इस पराजय की खबर वनाग्नि की भाँति चारों ओर शीघ्रता से फैल गई । उसके युद्ध मेँ मारे जाने की खबर भी उड़ा दी गई । इसका परिणाम यह निकला कि पंजाब की जनता ने उसके विरुद्ध बगावत का झण्डा खड़ा कर दिया । गोरी के सेनानायक ऐबक ने मुल्तान के सूबेदार की हत्या कर वह स्वयं वहॉ का शासक बन बैठा । इससे हालत और बिगड गई । खोखर जाति जो लाहौर और गजनी के मध्य आबाद थी, खुलकर विद्रोह में आ गई । चिनाब और झेलम के दोआब में लूट मचा दी । उन्होंने लाहौर को भी लूटने का प्रयास किया । पंजाब से गजनी राजस्व भेजना कठिन हो गया । इन विद्रोहियों को दबाने हेतु गोरी क्रो वापिस पंजाब लौटना पड़ा । उसने मुल्तान आकर खोखर जाति के विद्रोह को सख्ती से दबा दिया । हजारों खोखर संघर्ष में मारे गये और हजारों को वन्दी वना लिया गया । जिन्होंने जंगलों में जाकर बचने का प्रयास किया, उन जंगलों में आग लगा दी गई । परन्तु गोरी खोखरों की विद्रोही भावना को नहीं दबा सका । उसने कुतुबुद्दीन ऐवक्र को सूचना भिजवाई कि वह झेलम के मास आकर उससे मिले । परन्तु विद्रोहियों ने ऐबक क्रो भी घेरलिया । लेकिन अपनी वीरता से युद्ध काता हुआ और विद्रोहियों को खदेड़ता हुआ वह अपने स्वामी से आ मिला । उसकी सहायता से गोरी ने पंजाब का विद्रोह दबा अवश्य दिया, परन्तु विद्रोहियों की भावना को नहीं दबा सका । लाहौर से जब वह गज़नी लौट रहा था कि मार्ग में दमयक स्थान पर उसने अपना डेरा डाला । 15 अप्रेल, 1206 ईं. को जब वह सायंकालीन नमाज पढ़ रहा था कि उस समय कुछ शिया और कुछ हिन्दूखोखरों ने मिलकर उसका वध कर दिया ।

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