शाहबुहीन गोरी के भारत पर आक्रमण


शाहबुहीन गोरी के भारत पर आक्रमण




मुहम्मद गोरी की मुल्तान विजय शाहबुदीन गोरी ने प्रथम आक्रमण मुल्तान पर किया । इसका कारण यह था कि मुल्तान करमाथी (शिया) मुसलमानों के अधिकार में था । मुम्मी मुसलमान उन्हें इस्लाम द्रोही मानते हैं । दूसरा कारण यह था कि इसको विजित करने के उपरान्त गजनी और भारत के मध्य कोई रुकावट नहीं रहती थी । मार्ग सीधा मुल्तान होता हुआ गजनी को जाता था । अत: भारत आने-जाने की बाधा को दूर करने के लिए गोरी ने मुल्तान की बिजय परम-आवश्यक समझी । इसके अलावा मुल्तान बिजय के उपरान्त पंजाब और सिन्थ पर आक्रमण करने मेँ सुगमता होती थो । सैनिक दृष्टि से मुल्तान उस समय सुदृढ नहीं था । इन सब बातों का विचार कर 1175 ईं. मेँ मुहम्मद गोरो ने सर्वप्रथम मुल्तान पर धावा बोल दिया । यहाँ गोरी को गमता से बिजय मिल गई । इस्लाम विरोधी शिया सम्प्रदाय के लोगों के विरुद्ध गोरी के बड़े उत्साह से लड़े और उनक्रो परास्त करने में उन्हें अपार हर्ष हुआ तथा उनमें नवीन उत्साह का संचरण हुआ । मुल्तान को विजित कर मुहम्मद गोरी ने वहाँ अपना हाकिम नियुक्त कर दिया ।




उच्च को विजित करना (1176 ईं.) मुल्तान को विजित करने के ठपरान्त गोरी उच्च की ओर बढा और उसके दुर्ग पर अधिकार कर लिया । डॉ. एएल. श्रीवास्तव के मतानुसार, वीरता से अधिकार नहीं किया वरन् धोखे से अधिकार कर लिया । उच्च पर उस समय भाटी राजा राज्य का रहा था । उसके सम्बन्थ रानी से अच्छे नहीं थे । इसी कारण राजा को हार का मुँह देखना पड़ा ।




गुजरात पर आक्रमण (1178 ईं.) गोरी ने मुल्तान व उच्च को संगठित करना चाहा । इसमें उसने दो वर्ष लगा दिए । दो साल के विश्राम के उपरान्त गोरी गुजरात की तरफ चला । 1178 ईं. में सुल्तान ने अन्हिलवाड़ा पर आक्रमण किया । वहाँ के राजा मूलराज ने पाटन में गोरी क्रो करारी मात दी । मूलराज ने गोरी को अपने प्रदेश से खदेड दिया । इस पराजय से गोरी इतना आतंकित हुआ कि 20 वर्ष तक वह गुजरात की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सका । आक्रमण उसने मुल्तान में दो वर्ष विश्राम करने तथा सैनिक तैयारी के उपरान्त किया था । गुजरात के आक्रमण में गोरी क्रो रेगिस्तान ने उसी प्रकार परेशान किया जिस प्रकार महमूद गजनबी को किया था । इस अभियान मेँ गोरी के काफी सैनिक मारे गये । गजनी वह अपने चंद सैनिकों के साथ ही लौट सका था । सब बीर राजपूतों की तलवारों के शिकार बन गये । परन्तु मुस्तिम इतिहासकार प्रो. हबीबुल्ला ने इसे गोरी की सैनिक पराजय न बताकर उसकी योजना की असफलता बताई है ।




पंजाब पर पुना आक्रमण 1179 र्द. मेँ मुहम्मद गोरी ने पेशावर पर अधिकार कर लिया । सिंन्थ से वह जो धन लाया था उससे उसने अपनी सेना को संगठित कर लिया था । 1185 ईं. मैं उसने स्यालकोट पर मी अधिकार कर लिया । परन्तु वह पंजाब क्रो अभी तक विजित नहीं कर सका था । महमूद का उत्तराधिकारी सस्य मलिक उसके आक्रमणों को निरन्तर विफल का रहा था । अपनी गजनी की सुरक्षा तथा पर धावा बोलने की दृष्टि से उसे पहले पंजाब पर आक्रमण करना था न कि सिन्ध पर इस गलती कौ उसने बाद में महसूस किया । उसने जाना कि भारत पर आक्रमण करने का द्वार सिन्थ नहीं पंजाब है । इसलिए उसने अपनी नीति बदल दी और 1179 ई. में उसने पेशावर पर आक्रमण किया । यह अभी गजनवी के शासन अधिकार में था 1 इस पर अधिकार करने के उपरान्त उसने 1181 ईं. में पंजाब पर आक्रमण किया, क्योंकि पंजाब पर अधिकार करना अत्यन्त आवश्यक था । हिम्मत करके उसने 1185 ई. में खुसरव मलिक पर फिर आक्रमण कर दिया ।




इस आक्रमण मेँ खुसरव मलिक ने अपनी पराजय का आभास किया । इस कारण उसने सुल्तान के पास कीमती जवाहरात भेंट में भेजे तथा अपने चार वर्षीय पुत्र क्रो बन्थक के रूप मेँ भेजा । इसने गोरी की महत्वाकांक्षा को और बढा दिया और उसने 1185 ईं. मेँ लाहौर (1,३11०1१) पर पुन: धावा बोल दिया । इस बार ग्रामीण प्रदेशों को अपनी लूट का निशाना बनाया । सियालकोट का दुर्ग भी उसके अधिकार में आ गया 1 इस दुर्ग की उसने मरम्मत करवाईं । सामरिक सामग्री से उसे पूर्ण कर दिया और सुरक्षा सैनिक उसमें तैनात कर दिए । खुसरव को और निर्बल बनाने हेतु गोरी ने 1185 ईं. के आक्रमण में कश्मीर नरेश की भी सहायता ली । इस सहायता के बदले गोरी ने कश्मीर नरेश को खोखरों के विरुद्ध सहायता देने का वचन दिया । इस समझौते के उपरान्त गोरी ने हिम्मत कर के 1186 ई. में लाहौर पर पुन: आक्रमण किया 1 इस बार लाहौर को घेर लिया गया । गजनबी का उत्तराधिकारी बन्दी बना लिया गया और उसे गजनी भेज दिया गया । लाहौर तथा शेष गजनी पर शहाबुद्दीन गोरी का अधिकार हो गया 1 1192 ईं. में खुसरव को गरजिस्तान में मौत के घाट उतरवा दिया गया । इस प्रकार गोरी ने सिन्ध, मुलतान और पंजाब को गोर साम्राज्य का अंग बना लिया और गजनबी ‘के शासन का सदा के लिए अन्त कर दिया । 1189 ईं. में उसने मटिण्डा के दुर्ग पर अधिकार किया ।




गोरी का भारत से सम्पर्क पंजाब को विजय के उपरान्त गोरी के साम्राज्य की सीमाएँ अजमेर व दिल्ली से छूने लगीं और ये प्रदेश पृथ्वीराज चौहान के साम्राज्य के अंग थे । पृथ्वीराज चौहान उस समय उत्तरी भारत में सर्वाधिक प्रतापी व शक्तिशाली नरेश था । उत्तरी भारत के हिन्दू नरेशों को सुबुवत्तगीन तथा महमूद गजनबी के आक्रमणों से अच्छा अनुभव हो गया था । वे भारत को अब ग्यारहवीं सदी का छिन्नदृभिन्न भारत रखना नहीं चाहते थे । पृथ्वीराज चौहान सब राजपूत नरेशों क्रो एक छत्र के नीचे लाने का प्रयास कर रहा था । राजपूत नरेश दूरदर्शी होने के साथ-साथ अधिक बुद्धिमान भी हो गये थे । उन्होंने अपनी सेनाओं क्रो सुदृढ बनाने हेतु संगठित कर लिया था । परन्तु उनकी साम्राज्यवादी नीति ने उनमें दररिं भी ठत्पन्न कर दी थीं । पृथ्वीराज और जयचन्द एक-दूसरे के कट्टर शत्रु बन गये थे । वे पडौसी राज्यों को विजित करने में अपना गौरव समझते थे ।




मुहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान : उत्तरी भारत के प्रमुख राजपूत नरेशों में उनका मुखिया अजमेर का राजा पृथ्वीराज चौहान था । पंजाब पर जब मुहम्मद गोरी ने अधिकार कर लिया तो पृथ्वीराज को आभास हो गया था कि अब गोरी दिल्ली पर आक्रमण करेगा । अत: उसने सैनिक तैयारियों पहले से आरम्भ का दो थीं । पृथ्वीराज एक महान् योद्धा तथा राजनीतिज्ञ था 1 उसे अपने पर पूरा विस्वास था कि वह तुर्क आक्रमणकारियों को भारत से खदेड देगा । फिर भी उसने उत्तर भारत के राजपूत नरेशों का एक संघ बनाया । लेकिन कनौज का राजा जयचन्द उसके संघ में सम्मिलित नहीं’ हुआ । उधर मुहम्मद गोरी साम्राज्यवाद के ज्वर से पीडित था । वह पृथ्वीराज क्रो परास्त कर गंगा-सिंन्यु मैदान में अपना साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था । 1189 ईं. में जब गोरी को भटिण्डा पर अधिकार करने में सफलता मिल गई तो इसमें उसने पृथ्वीरश्र्व चौहान की कुछ निर्बलता समझी ।




तराईन का प्रथम युद्ध (1191 ईं.) भटिण्डा पर अधिकार करने के उपरान्त गोरी गजनी लौट रहा था, परन्तु उसके पीठ फेरते ही पृथ्वीराज भटिण्डा को प्राप्त करने की नीयत से वहाँ जा पहुँचा । ज्योंही इसकी खबर मुहम्मद गोरी को मिलो कि वह सेना सहित लौट आया । राजपूत सेना में स्वतंत्रता की रक्षा की प्रबल भावना थी । अत: पृथ्वीराज के नेतृत्व में राजपूत सेना थामेश्वर से चौदह मील दूर तराइन के मैदान मेँ आ डटी । इस मैदान में दोनों सेनाओं के मध्य भयंकर युद्ध लडा गया । गोबिन्दराय ने अपने आले से गोरी पर भयंकर प्रहार किया तो गोरी पीछे हटने को बाध्य हो राया । उसका एक सरदार खलजो उसे घोडे पर बिठाकर युद्ध क्षेत्र से ले भागा । इस प्रकार गोरी के प्राण एक स्वम्मी भदत ख़ल्जी ने बचाये । भागती हुई तुर्क सेना का राजपूतों ने 40 मील तक पीछा किया और राजपूतों ने भटिण्डा पर पुन: अपना अधिकार कर लिया ।1 परन्तु इसमें उसे तेरह मास खर्च काने पड़े ।




युद्ध के परिणाम इस पराजय से मुहम्मद गोरी को इतनी ग्लानि हुईं जितनी उसे गुजरात पराजय से नहीं हुईं थी । रलानी के अलावा वह इतना भयभीत हो गया कि वह न पंजाब मेँ रुको का साहस का सका और न सिन्ध मेँ । वह सीधा गजनी गया और अपने सैनिक्रो पर बरस पड़ा । उसका आक्षेप था कि उसकी यह पराजय अफगान,खिलजी और खुरासान नायकों की लापरवाही के कारण हुईं । उसने उनकी भर्त्सना की और बहुत-सो को जेल में डाल दिया । उसने पृथ्वीराज को परास्त करने का प्रण किया । इसके उपरान्त वह सैनिक तैयारियों में जुट गया । उसने एकलाख बीस हजार अश्वारोही तैयार किए ।




तराइन का दूसरा युद्ध (1192 ईं॰) त्तराइन के प्रथम युद्ध में शहाबुद्दीन परास्त ‘अवश्य हो गया था, पर वह निराश नहीं हुआ था । उसने विशाल एवं शक्तिशाली सेना का गठन किया और 1192 ई. में वह भारत के लिए रवाना हो गया । लाहौर आकर उसने किवामुल्युल्क क्रो दूत के रूप में चौहान नरेश के पास भेजा और कहलाया कि वह उसकी अधीनता स्वीकार कर ले । इस प्रस्ताव पर पृथ्वीराज अरग-बबूला हो गया और उसने कहलाया कि इसका उत्तर वह युद्धभूमि में देगा । अत: दोनों की सेनाएँ फिर त्तराइन के मैदान में आ डर्टी । फरिश्ता के अनुसार, चौहान की सेना में 5 लाख सैनिक व तीन हजार हाथी थे । 150 राजपूत राजकुमार उसकी सेना में सम्मिलित थे । परन्तु फरिश्ता का यह कथन अत्युक्तिपूर्ण लगता है । क्लोज के राजा जयचन्द ने गोरी क्रो भारत आने का निमन्त्रण व सहायता देने का वायदा अवश्य किया और जयचन्द पृथ्वीराज की सहायता के लिए अत्या भी नहीं ।




पृथ्वीराज की सेना से शहाबुद्दीन पुन: भयभीत हो गया और उसने अपने ज्येष्ठ भाता की ओट में छद्म नीति का सहारा लेने का प्रयास किया । एक दिन अचानक विश्राम करती राजपूत सेना पर तुर्की सेना ने धावा बोल दिया । युद्ध में राजपूत परास्त हुए । पृथ्वीराज को घायल




अवस्था में बन्दी बनाकर गजनी ले जाया गया । परन्तु कुछ इतिहासकारों का कहना है कि तुर्कों ने युद्धभूमि मेँ ही सिरसा के समीप पृथ्वीराज को मरवा दिया । अत: स्पष्ट है कि दूसरे तराई के युद्ध में राजपूतों की हार हुईं और दिल्लीअजमेर पर तुकों का अधिकार हो गया । डॉ. गोपीनाथ शर्मा व डॉ. दशरथ शर्मा का कहना है कि पृथ्वीराज चौहान का अन्त अजमेर में ही हुआ ।




युद्ध में राजपूतों की पराजय के कारण




  • पृथ्वीराज का अति महत्वाकांक्षी होना ।
  • अपने पडौसी नरेशों से पृथ्वीराज की शत्रुता होना ।
  • पृथ्वीराज का शहाबुद्दीन के बहकावे में आना ।
  • पृथ्वीराज का युद्धभूमि से पलायन करना ।
  • तराई के प्रथम युद्ध में गोरी को परास्त कर पृथ्वीराज का निश्चिन्त होना ।
  • तराई के प्रथम युद्ध में घायल गोरी को मृत्यु के घाट न उतारना ।
  • शहाबुद्दीन के अश्वारोही सैनिकों का राजपूत मुकाबला नहीं कर सके ।
  • जयचन्द्र का पृथ्वीराज को सहयोग न करना ।




तराइन के दूसरे युद्ध के परिणाम तराइन के दूसरे युद्ध ने भारत के इतिहास को एक नवीन मोड़ दे दिया ।1 यह युद्ध निर्णायक युद्ध सिद्ध हुआ और इससे मुहम्मद गोरी क्रो भारत विजय निश्चित हो गई । इस बिजय से मुहम्मद गोरी का साम्राज्य दिल्ली तक विस्तृत हो गया । उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ने मेरठ क्रो जीत लिया । 1193 ईं. में कुतुबुद्दीन ने मेरठ से निकल कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया । त्तराइन की बिजय के उपरान्त गोरी क्रो कहीं भी राजपूतों की संयुक्त सेनाओं का मुकाबला नहीं करना पड़ा । इस प्रकार तराइन के दूसरे युद्ध ने भारत मेँ मुस्लिम राज्य की स्थापना क्रो गम बना दिया । इसीलिए वीए. स्मिथ ने तराइन के दूसरे युद्ध को एक निर्णायक युद्धबतायाहैं । उत्तर भारत की केन्दीय शक्ति मुसलमानों के हाथों मेँ आ गई । राजपूतों में अब कोई नरेश ऐसा नहीं बचा जो मुसलमानों के आक्रमणों का सामना करने के लिए अपने झण्डे के नीचे अन्य राजपूत राजाओं क्रो संगठित कर सकता था । तराइन के मैदान में बिजय प्राप्त करने के ठपरान्त वह भारत में आगे उसी प्रकार आगे बढ़ता रहा और उसे कोई नहीं रोक सका । इस युद्ध का सर्वाधिक विनाशकारी परिणाम चौहान वंश को झेलना पड़ा । चौहान वंश की समाप्ति ने भारत मेँ मुस्लिम विजय क्रो सुनिश्चित कर दिया तथा तुर्कों राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया । चाहे तुर्कों के भारत आगमन से यहॉ की संस्कृति व सभ्यता पर दूरगामी व स्थायी प्रभाव नहीं पड़े, परन्तु प्रशासन में महान् परिवर्तन अवश्य आ गये ।




भारत में मुस्लिम धार्मिक राज्य की स्थापना हो गईं । शासन का सर्वोच्चाधिकारी सुल्तान होने लगा । भारतीय शासक होते हुए भी वह स्वयं को खलिफा के आधीन समझने लगा । वह कुरान की शरीयतों के आधार पर शासन काने लगा । हिन्दुओँ को राजकीय सेवाओँ से वंचित रखा गया । सुल्तानों ने इस्लामिया साम्प्रदायिकता को सुदृढ कर दिया । हिन्दू और मुसलमान एक नदी के दो किनारे हो गये । साम्प्रदायिकता रूपी रक्त ने दोनों किनारों को मिलाने हेतु कोई सेतु निर्मित नहीं होने दिया । देवालयों के निरन्तर धराशायी व देवमूर्तिर्यो के खण्डित होने से साम्प्रदायिकता का रक्त नदी में सतत् खावित होता ही रहा । हिन्दुओँ को नागरिकता के अधिकार भी प्राप्त नहीं थे । हिन्दुओँ क्रो बलात् मुसलमान बनाकर अपनी संख्या में निरन्तरवृद्धि की गई ।




तराइन के दूसरे युद्ध की समाप्ति पर कुतुबुद्दीन ऐबक के नेतृत्व में इन्द्रप्रस्थ में एक सेना रख दी । कुतुबुद्दीन को निर्देश दिया गया कि वह दिल्ली व अजमेर के हिन्दूशासकों को सन्धि की शर्तें स्वीकार करने तथा सुल्तान की अधीनता स्वीकार करने क्रो बाध्य करे । शहाबुद्दीन गोरी ने अजमेर और दिल्ली तथा शेष सभी चौहान साम्राज्य पर एक साथ अधिकार करना बुद्धिमानी का कार्य नहीं समझा । उसकी नीति थी कि मुँह में इतना ग्रास लो जिसको आसानी से चबाया जा सके और निगला जा सके । अधिक लोभ काना अहितकर ही होता है । अत: उसने दिल्ली के तोमर नरेश को करद शासक बना लिया और अजमेर का शासन पृथ्वीराज के पुत्र गोविन्दरांज़ को सौंप दिया । गोविन्दराज ने वार्षिक कर देना स्वीकार का लिया । गोविन्दराज क्रो यह भी आदेश दिया गया कि जो दुर्ग व प्रदेश झ्वनुदीन के अधिकार में आ गये हैँ…-उन्हें वह वापिस लेने का प्रयास नहीं को । इन दो राजपूत नरेशों को अपना काद इसलिए बनाया था ताकि राजपूत नरेशों में आपसी फूट उत्पन्न हो जाये । इसके अलावा आनो इस नीति से वह अपने ऊपर प्रशासनिक भार भी अघिक नहीं लेना चाहता था । चातुयूँपूर्ण व कूटनीतिपूर्ण व्यवस्था करके शहाबुद्दीन गोरी गज़नी लौट गया ।

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