हॉर्स शू क्रेब

      हॉर्स शू क्रेब 

         कोई जीव उत्क्रांति के लंबे और कुदरत के संघर्षपूर्ण दौर में करोड़ो साल तक जिंदा रह जाता है और ऐसा हो कि अचानक उसकी तादाद घटने लगती है , आखिर में उसका अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाए ऐसा होता है ? हालांकि उसके अस्तित्व को खतरे में डालने वाले कारण कुदरती रूप से उस जीव की विरुद्ध हो तब ऐसा हो सकता है । लेकिन ऐसे संजोग अगर कुदरती हो तो वह जीव अनुकूलन साध कर भी अपना अस्तित्व बनाये रखता है , लेकिन ये कारण कृत्रिम हो तो ? उनके सामने उस जीव की एक नहि चलती !
ऐसा ही हुआ है हॉर्स शू क्रेब के नाम से जाने जाते है । जिसका आकार वाकय में हॉर्स के शू जैसा है । शायद इस लिए ही उसका नाम हॉर्स शू क्रेब पड़ा है । जिसका अस्तित्व हमारी पृथ्वी पर पिछले 25 करोड़ से 30 करोड़ से है । जो लगभग सोलह जितने हिमयुग को खा चूका है । लेकिन आज मानो वह नामशेष होने की तैयारी में ऐसे उसकी बस्ती कम हो रही है , और वह भी बहुत तेजी से !

    कारण बिल्कुल साफ़ है : वह है स्वार्थी इंसान ! इंसान अपने अपने स्वार्थ की वजह से इसके पीछे हाथ धो के पड़ा है । क्योंकि इंसान को इसमें कुछ ऐसे नैसर्गिक गुण माइक है जो तबीबी विज्ञान को महत्वपूर्ण मोड़ दे सकते है । खास कर इस क्रेब का भूरे रंग का तांबा युक्त खून जिसमें रहे सत्व बड़ी उम्र में हड्डियों की कमिनके कारण होते ओस्टियोपोरोसिस नाम के दर्द में , डायबिटीज कर फेफड़ो की बीमारियों में रामबाण इलाज साबित हो सकता है । क्रेब की ढाल जैसा कवच भी तबीबी विज्ञान में काफ़ी उपयोगी साबित हुआ है । क्योंकि उसके रासायनिक सत्व खखम को भरने में कारगत साबित हुए हैं।
       हॉर्स शू क्रेब की ऐसी खूबियां जब सन 1964 में पहली बार वैज्ञानिक के नजरो में आई बस तब से इस बेचारे की वाट लगी हुई हैं। अमरीका के पूर्व किनारे और भारत के उड़ीसा और बंगाल के किनारों पर एक समय हॉर्स शू की संख्या और तादाद लाखो में थी । ये क्रेब यहाँ प्रजोत्तप्ति के लिए आते थे । कुछ महीने रुकने बाद वापस समंदर में चले जाते थे । लेकिन इन जीवों की औषधीय खुबिया जब जाहिर हुई तो इनकी शामत आई । उनका बेफाम् शिकार होने लगा। यहां तक रिसर्च के बहाने भी उनका शिकार किया जाने लगा । और तो और इन क्रेब के सुखाए हुए दाने मुर्घि और बतख के लिए बहुत पोषण युक्त खुराक है , ये भी पता चला , फिर तो क्या कहना सब पोल्ट्री फार्म वालो की काली नजर भी इन पर आ गई ।

      परिणाम ! अमरीका के पूर्व किनारे प्रजोत्तप्ति के आने वाले हॉर्स शू क्रेब की संख्या तीन दसको में खासी कम हो गई । भारत की बात करे तो यहां पर भी उसे बेरोकटोक पकड़ा जाता हैं। उड़ीसा के चांदी पुर के मछवारे इनका बड़े पैमाने पर शिकार करते है। जिनको सस्ते दाम पर ( एक नंद के पचास पैसे ) भुवनेश्वर भेज दिया जाता है । फिर यहां से ऊँचे दामो पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेच दिया जाता है । भारत का पर्यावरण डिपार्टमेंट चाहे तो इस पर देखरेख रख सकता है । लेकिन जहां इंसानों को नम्बर ही नहीं आता वहां इन बेचारे क्रेब का नम्बर कैसे लगेगा ? लेकिन इन सब के बीच निर्दोष हॉर्स शू क्रेब की दुनिया लूटी जा रही है , वह भी बिल्कुल सहजता से !

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